हरियाणा निकाय चुनाव में सफलता ने भाजपा में भरा जोश, कांग्रेस नही पहचान पाई अपनी ताकत

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हरियाणा निकाय चुनाव में सफलता ने भाजपा में भरा जोश, कांग्रेस नही पहचान पाई अपनी ताकत

-कांग्रेस की आंतरिक कलह का फायदा नही उठा पाई आप, हरियाणा में हो गई चित

नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/चंडीगढ़/शिव कुमार यादव/- हरियाणा की 46 नगरपालिकाओं के चुनाव परिणाम सामने आ चुके हैं। भाजपा ने 22 में जीत हासिल कर अपने विरोधियों पर स्पष्ट बढ़त बना ली। वहीं, उसकी सहयोगी जजपा सिर्फ तीन में जीत हासिल करने में सफल रही। बाकी के स्थानीय निकायों में कांग्रेस की धमक दिखी। आम आदमी पार्टी को सिर्फ एक सीट से संतोष करना पड़ा। राज्य के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए इन परिणामों के अलग-अलग मायने हैं। हालांकि अब सभी पार्टियां अपनी खामियों पर मंथन कर रही है लेकिन भाजपा के लिए यह जीत अलग ही मायने रखती है। इन चुनावों में मिली सफलता ने भाजपा कार्यकर्ताओं में पूरा जोश भर दिया है। वहीं कांग्रेस इस बार भी आंतरिक कलह के चलते अपनी ताकत नही पहचान पाई और चित हो गई।
                नगर निगम के चुनाव ग्रामीण मतदाताओं के मूड को नहीं दर्शाते हैं। लेकिन ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले कई लोग छोटे शहरों में रहते हैं और कई अन्य कृषि अर्थव्यवस्था पर निर्भर हैं। ये परिणाम यह संकेत देते हैं कि भाजपा किसान आंदोलन के दौरान हुई राजनीतिक क्षति को दूर कर रही है। दिलचस्प बात यह है कि भाजपा को किसान आंदोलन के दौरान होने वाले दोनों उपचुनावों (बड़ौदा और एलेनाबाद) में हार का सामना करना पड़ा था।

चुनावों में देरी से सत्तारूढ़ गठबंधन को मदद मिली?
अदालती मामलों और अन्य तकनीकी कारणों से स्थानीय निकाय चुनावों में महीनों की देरी हुई। हालांकि विपक्ष ने देरी के लिए सत्तारूढ़ पार्टी के राजनीतिक मंसूबों को जिम्मेदार ठहराया। अगर ये चुनाव तय कार्यक्रम के अनुसार यानी किसान आंदोलन के दौरान होते तो जमीनी स्तर पर बढ़ते विरोध के बीच भाजपा-जजपा के लिए प्रचार करना भी मुश्किल हो जाता। इसके अलावा, भाजपा की हालिया विधानसभा चुनावों विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में मिली जीत से हरियाणा के पार्टी कैडर का भी मनोबल बढ़ा है।

अंदरूनी कलह से कांग्रेस को नुकसान हुआ?
हरियाणा कांग्रेस में कभी न खत्म होने वाले झगड़ों के कारण स्थानीय स्तर पर अपने संगठनात्मक ढांचे को बढ़ावा नहीं दे पाई है। हाल के महीनों में राज्य के दिग्गजों के बीच अंदरूनी कलह तेज होने के कारण कांग्रेस ने पार्टी के चुनाव चिह्न पर ये चुनाव नहीं लड़ा। इसके अलावा, कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी समर्थित उम्मीदवारों के लिए प्रचार नहीं किया। पूर्व सीएम भूपिंदर सिंह हुड्डा को राज्य के मामलों को चलाने में एक हद तक स्वतंत्रता मिली। राज्यसभा चुनाव के दौरान कुलदीप बिश्नोई ने कांग्रेस का विरोध करते हुए पार्टी के खिलाफ मतदान किया। इन सबके बावजूद पार्टी अभी भी दावा करती है कि नगर निकाय चुनाव में जीते 19 निर्दलीय उम्मीदवारों को उसका समर्थन प्राप्त था।

कांग्रेस की गैरमौजूदगी के बावजूद आप नहीं कर पाई प्रदर्शन
कैथल जिले की एक छोटी नगरपालिका (इस्माइलाबाद) जीतकर आप अपना खाता खोलने में सफल रही है। आप को विशेष रूप से विधानसभा चुनावों में पड़ोसी राज्य पंजाब में शानदार जीत के बाद यहां प्रभावशाली प्रदर्शन की उम्मीद थी। लेकिन कांग्रेस के सक्रिय रूप से चुनावी मैदान में नहीं उतरने के बावजूद आप उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन करने में असफल रही।
              राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नतीजे बताते हैं कि राज्य में अपना आधार बढ़ाने की कोशिश में आम आदी पार्टी को पंजाब या दिल्ली जितना आसान नहीं लगेगा। हालांकि, पार्टी के चुनाव चिह्न पर लड़कर आप ने यह सुनिश्चित कर लिया है कि भविष्य में होने वाले मुकाबले के लिए उसके पास जमीन पर समर्पित स्वयंसेवक हैं।

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