नींद की गोलियों से दूर रहने की सलाह, ‘स्लीप हाइजीन’ और वैदिक ‘स्वर विज्ञान’ को बताया स्थायी समाधान

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-विश्व नींद दिवस पर विशेष संगोष्ठी का आयोजन

नई दिल्ली/उमा सक्सेना/-  विश्व नींद दिवस के अवसर पर 15 मार्च 2026 को पटना और दिल्ली में राम जानकी संस्थान पॉजिटिव ब्रॉडकास्टिंग हाउस (आरजेएस पीबीएच) और पॉजिटिव मीडिया के संयुक्त तत्वावधान में एक विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में चिकित्सा और आध्यात्मिक क्षेत्र के विशेषज्ञों ने अनिद्रा और नींद से जुड़ी बढ़ती समस्याओं पर गंभीर चिंता व्यक्त की। वक्ताओं ने कहा कि आधुनिक जीवनशैली के कारण लोगों की नींद प्रभावित हो रही है और नींद की गोलियों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है, जो लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

आधुनिक विज्ञान और वैदिक ज्ञान के समन्वय पर जोर
संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने आधुनिक स्लीप हाइजीन और प्राचीन वैदिक स्वर विज्ञान के संतुलित उपयोग को नींद संबंधी समस्याओं का प्रभावी समाधान बताया। वक्ताओं का कहना था कि प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणाली शरीर की प्राकृतिक लय को समझने और उसे संतुलित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन देती है। यदि इन सिद्धांतों को आधुनिक वैज्ञानिक समझ के साथ जोड़ा जाए तो अनिद्रा जैसी समस्याओं से स्थायी राहत मिल सकती है।

योग निद्रा का सजीव प्रदर्शन
कार्यक्रम के सह-आयोजक और 82 वर्षीय साधक ओम प्रकाश ने इस अवसर पर योग निद्रा का सजीव प्रदर्शन कर उपस्थित लोगों को स्वस्थ जीवनशैली का संदेश दिया। उन्होंने बताया कि सही आहार, संतुलित दिनचर्या और पर्याप्त नींद के माध्यम से व्यक्ति वृद्धावस्था में भी ऊर्जा और सक्रियता बनाए रख सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि सकारात्मक सोच और नियमित साधना से मानसिक शांति और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों को मजबूती मिलती है।

नींद की गोलियों के बढ़ते उपयोग पर चिंता
संगोष्ठी के प्रमुख वक्ताओं में से एक और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व राष्ट्रीय संयुक्त सचिव डॉ. नरेश चावला ने नींद की गोलियों के बढ़ते उपयोग को चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा कि कई लोग अनिद्रा से राहत पाने के लिए रासायनिक दवाओं पर निर्भर हो रहे हैं, जबकि यह केवल अस्थायी समाधान है। उनके अनुसार प्राकृतिक नींद शरीर के लिए मरम्मत प्रक्रिया की तरह होती है और यदि इसे कृत्रिम दवाओं से प्रभावित किया जाता है तो शरीर की जैविक प्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

स्वर विज्ञान और जैविक घड़ी का संबंध
श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी चरणाश्रित गिरी ने स्वर विज्ञान के सिद्धांतों पर विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि मानव शरीर की लय सूर्य और चंद्रमा की ऊर्जा से प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि नासिका के माध्यम से चलने वाले श्वास प्रवाह का शरीर की मानसिक और शारीरिक स्थिति पर गहरा प्रभाव पड़ता है। उनके अनुसार ध्यान, त्राटक और नियंत्रित श्वास अभ्यास के माध्यम से शरीर की जैविक घड़ी को संतुलित किया जा सकता है।

डिजिटल जीवनशैली से बढ़ रही अनिद्रा
कार्यक्रम में वक्ताओं ने यह भी कहा कि आधुनिक डिजिटल जीवनशैली के कारण लोगों की नींद पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। देर रात तक मोबाइल और अन्य स्क्रीन के उपयोग से शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे अनिद्रा की समस्या बढ़ती है। विशेषज्ञों ने युवाओं में बढ़ती डिजिटल निर्भरता को भी नींद की समस्या का एक बड़ा कारण बताया।

सामाजिक जीवन पर भी पड़ रहा असर
संगोष्ठी में यह भी चर्चा हुई कि नींद की कमी केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक जीवन पर भी इसका असर पड़ता है। विशेषज्ञों के अनुसार अनिद्रा से चिड़चिड़ापन, तनाव और निर्णय क्षमता में कमी जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं, जिससे पारिवारिक और सामाजिक संबंधों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

सकारात्मक जीवनशैली अपनाने का आह्वान
कार्यक्रम के समापन पर वक्ताओं ने लोगों से संतुलित जीवनशैली अपनाने, नियमित दिनचर्या बनाने और प्राकृतिक तरीकों से अच्छी नींद लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति अपने आहार, दिनचर्या और मानसिक स्थिति को संतुलित रखे तो अनिद्रा जैसी समस्याओं से काफी हद तक बचा जा सकता है।

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