92% अंक आने के बाद भी टूटी छात्रा, पढ़ाई के दबाव ने छीनी मुस्कान

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October 14, 2026

हर ख़बर पर हमारी पकड़

-कानपुर की छात्रा की मौत ने खड़े किए कई सवाल

कानपुर/उमा सक्सेना/- कानपुर में 16 वर्षीय छात्रा वैशाली सिंह की मौत ने पढ़ाई के बढ़ते दबाव और बच्चों पर बन रहे मानसिक तनाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वैशाली ने हाईस्कूल परीक्षा में 92 प्रतिशत अंक हासिल किए थे, लेकिन वह इससे अधिक अंक लाना चाहती थी। परिणाम आने के बाद से वह बेहद उदास और तनाव में बताई जा रही थी।

परिवार की उम्मीदों और अपने लक्ष्य के बीच घिर गई थी वैशाली
वैशाली केंद्रीय विद्यालय में पढ़ती थी। परिवार के अनुसार वह पढ़ाई में बेहद मेहनती थी और हमेशा बेहतर प्रदर्शन करना चाहती थी। उसके पिता का दो वर्ष पहले निधन हो चुका था और मां नौकरी कर घर संभाल रही थीं। ऐसे में वैशाली खुद पर बड़ी जिम्मेदारी महसूस करती थी और उसे लगता था कि उसे हर हाल में परिवार की उम्मीदों पर खरा उतरना है।

साथियों को भेजा भावुक संदेश
परिजनों और पुलिस के अनुसार, छात्रा ने अपने कुछ साथियों को एक भावुक संदेश भेजा था, जिसमें उसने अपने ऊपर बढ़ते दबाव, डर और निराशा की बात कही थी। उसने खुद को बेहद अकेला और टूटा हुआ महसूस होने की बात कही थी। यह संदेश अब इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि वह लंबे समय से मानसिक तनाव से गुजर रही थी।

भाई ने लगाए शिक्षकों पर दबाव बनाने के आरोप
वैशाली के भाई प्रिंस ने आरोप लगाया कि स्कूल में कुछ शिक्षक उसकी तुलना उससे करते थे और इसी वजह से वैशाली पर लगातार पढ़ाई का दबाव बढ़ता गया। भाई का कहना है कि बहन अक्सर बताती थी कि उससे कहा जाता था कि वह अच्छे अंक नहीं ला पाएगी। इन बातों का उसके मन पर गहरा असर पड़ा और वह धीरे-धीरे तनाव में रहने लगी।

मां बोलीं- बेटी पर था बहुत दबाव
मां का कहना है कि वैशाली दिन-रात पढ़ाई करती थी और हमेशा बेहतर अंक लाने की कोशिश में लगी रहती थी। परिवार का आरोप है कि पढ़ाई का अत्यधिक दबाव उसकी मानसिक स्थिति पर असर डाल रहा था। पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है और छात्रा का मोबाइल फोन भी जांच के लिए अपने कब्जे में लिया है।

बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने की जरूरत
यह घटना एक बार फिर इस बात की याद दिलाती है कि अंकों से ज्यादा जरूरी बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य है। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को केवल नंबरों के आधार पर नहीं परखा जाना चाहिए। परिवार, स्कूल और समाज को मिलकर ऐसा माहौल बनाना होगा जहां बच्चे बिना डर और दबाव के अपनी बात कह सकें।

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