जंगलों के बीच चल रहे स्कूल की पूरे देश में हो रही चर्चा

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जंगलों के बीच चल रहे स्कूल की पूरे देश में हो रही चर्चा

नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/तेलंगाना/नई दिल्ली/शिव कुमार यादव/भावना शर्मा/- कोरोना वायरस महामारी की वजह से तेलंगाना में भारी परेशानी का सामना कर रहे आदिवासियों के लिए उस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्र ईसरम संतोष एक मसीहा बनकर सामने आये है। ईसरम संतोष ने जब देखा की गांव में भूखमरी का कारण उनका अशिक्षित होना है तो उन्होने तुरंत आदिवासी बच्चों के लिए एक झोपड़ी में स्कूल के रूप में भीम चिल्ड्रेन हैप्पीनेस सेंटर की स्थापना की और बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। उनके इस कार्य से न केवल गांव की दशा में तेजी से बदलाव हुआ है बल्कि अब बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ पैसा भी कमाने लगे है। ईसरम संतोष के इस कार्य की चर्चा अब पूरे देश में हो रही है और खासकर तेलंगाना में तो उन्हे आदिवासियों का मसीहा माना जा रहा है।
महामारी की वजह से हैदराबाद से लगभग 200 किमी दूर मुलुगु जिले के जंगलों के बीच रह रहे गुट्टी कोया आदिवासी सीमित संसाधनों के साथ एक वक्त की रोटी के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन अब हैमलेट गांव के इन लोगों के लिए 26 वर्षीय उस्मानिया विश्वविद्यालय के छात्र ईसरम संतोष इन लोगों के लिए आवश्यक आपूर्ति कर रहे हैं। यहां बता दें कि संतोष साइबर लॉ के छात्र हैं और छात्रावास बंद होने की वजह से मुलुगु जिले के नारलापुर में अपने घर लौटे हैं। राहत कार्य के बीच संतोष ने महसूस किया कि 150 लोगों के समुदाय में शिक्षा की कमी है। यहां के बच्चों ने अपने जीवन में कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा। उन्होंने इन बच्चों को पढ़ाने की योजना बनाई। उन्होंने एक एक झोपड़ी में स्कूल के रूप में भीम चिल्ड्रेन हैप्पीनेस सेंटर की स्थापना की जिसमें आज 35 से 40 छात्र अंग्रेजी, गणित और तेलुगु सीख रहे हैं।
एक बच्चे के पिता परमेश एम जो कि राजमिस्री हैं ने कहा कि अब तक, बच्चे अपना अधिकांश समय जंगल में खेलने में बिताते थे। अब हमें उम्मीद है कि हमारे बच्चे वैसा जीवन नहीं जिएंगे जैसा हम जीते हैं। लॉकडाउन से पहले बस्ती के अधिकांश सदस्य चिनाई का काम करते थे। अब, वे लोग जंगल से फल और जामुन इकट्ठा करते हैं और 300 रुपये से 400 रुपये प्रतिदिन कमाने के लिए काम करते हैं।
हैमलेट के एक व्यक्ति ने कहा कि मुझे खुशी है कि मेरे बच्चे शिक्षित हो रहे हैं और अपना समय बेकार नहीं कर रहे हैं। उनका भविष्य अब खराब नहीं लगता। बता दें कि आदिवासियों के सपने को साकार करना संतोष के लिए आसान काम नहीं है। संतोष पिछले 30 दिनों से रोजाना 15 किमी की यात्रा कर रहे हैं। वह 10 किमी बाइक पर पांच किमी पैदल चलकर हैमलेट पहुंचते हैं। जिले से गांव को जोड़ने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है।
बता दें कि संतोष ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर किताबें और स्टेशनरी का इंतजाम किया और बच्चों को चॉकलेट, बिस्किट और अंडे बांटे। वह अब हैमलेट में एक पक्के स्कूल का निर्माण करना चाहते हैं और उन्हें सरकार के आवासीय आदिवासी कल्याण स्कूलों में भेजना चाहते हैं, ताकि वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें।

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