अब हमारे बीच नही रहे 93 साल के युवा समाजसेवी

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September 21, 2026

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अब हमारे बीच नही रहे 93 साल के युवा समाजसेवी

नजफगढ़ मैट्रो न्यूज /नजफगढ़/शिव कुमार यादव/- नजफगढ़ देहात में आर्य समाज को स्थापित करने वाले व महान समाजसेवी तथा यादव चैरिटेबल ट्रस्ट नजफगढ़ व रूक्मणी विहार वृंदावन धर्मशाला के संरक्षक रघुनाथ सिंह आर्य का 93 साल की उम्र में रविवार को निधन हो गया। उनके पंचतत्व में विलीन होते ही मानो एक समाज व एक युग की भी समाप्ती हो गई। 93 साल की उम्र में भी समाज के हित के सभी कामों में युवाओं से बढ़कर भागीदारी निभाने के चलते हुए लोगों ने उन्हे 93 साल के युवा की उपाधि दी थी। इतना ही नही उनकी बेटियों ने अपने पिता के दाह संस्कार में शामिल होकर मंत्रोच्चार के साथ पिता का अंतिम संस्कार कराया।

लोगों की माने तो प्रधान रघुनाथ सिंह आर्य ने इस क्षेत्र को एक नई दिशा देने का काम सदा किया है। वह 36 बिरादरी के हित के कामों के लिए हर वक्त तैयार रहते थे। आज भी लोग उनकी बातों व कामों से काफी प्रभावित थे। उन्होने क्षेत्र में आर्य समाज की नीतियों को बढ़ाने के लिए पूरा जीवन काम किया। जब उनके अपने भी उनके सिद्धांतों को लेकर उनका विरोध कर रहे थे तो उस समय प्रधान जी नजफगढ़ में जगह-जगह आर्य समाज के मंदिर व सम्मेलनों का आयोजन कर लोगों को कुप्रथाओं से बचाने के प्रयास में लगे थे। एक दिन ऐसा भी आया जब प्रधान जी के विचारों का जादू चला और लोग उनसे जुड़ते चले गये। यहां तक परिवार भी अब उनका सहयोग करने लगा। सुरहेड़ा के पूर्व प्रधान त्रिभुवन यादव, जाफरपुर से राव तुलाराम समिति के पूर्व अध्यक्ष नारायण यादव व दिल्ली नगर निगम के पूर्व नेता विपक्ष जयकिशन शर्मा की माने तो प्रधान जी अपने आप में एक समाज थे, वो जो भी काम करते थे उसे पूरा करके ही दम लेते थे। उन्होने सर्व समाज के हित के लिए क्षेत्र में यादव चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना कर उसके भवन के लिए 750 वर्गगज जमीन दान में दी और छः मंजिला भवन अपनी देखरेख में बनवाया। हालांकि लोगों ने काफी ताने भी मारे लेकिन प्रधान जी ने उसे पूरा करके ही दम लिया। आज इस भवन में सर्वसमाज के लोग अपने सामाजिक व मांगलिक कार्यों को पूरा करते है। प्रधान जी अपने पीछे एक भरापूरा परिवार जिसमें उनकी छः बेटियां है को छोड़कर गये है। जो उनके सपने को आगे बढ़ाने के लिए वचनबद्ध खड़ी हैं। सोमवार को उनकी मुर्खाअिग्न के समय भी सभी बेटियां उनके साथ खड़ी रही और गुरूकुल की कन्याओं के साथ मंत्रोच्चार कर अपने पिता का दाह संस्कार करवाया।

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