हिमालयी राज्यों में आपदाओं पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “पेड़ों की अवैध कटाई बड़ी वजह”

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हिमालयी राज्यों में आपदाओं पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “पेड़ों की अवैध कटाई बड़ी वजह”

-सर्वोच्च न्यायालय ने लिया संज्ञान

नई दिल्ली/उमा सक्सेना/- उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में आए विनाशकारी भूस्खलन और बाढ़ पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि पहाड़ी इलाकों में जंगलों की अनियंत्रित कटाई से प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ गया है। न्यायालय ने इस मसले को गंभीर मानते हुए केंद्र सरकार, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और अन्य संबंधित एजेंसियों से जवाब तलब किया है।

याचिका पर हुई सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में दावा किया गया था कि हिमालयी राज्यों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की अवैध कटाई और निर्माण कार्यों ने पर्यावरण असंतुलन पैदा किया है, जिससे हर साल बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। इस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि बाढ़ के दौरान नदियों में बहकर आई भारी मात्रा में लकड़ी इस बात का संकेत है कि जंगलों की कटाई बेकाबू हो चुकी है। अदालत ने इसे अत्यंत गंभीर पर्यावरणीय संकट करार दिया।

किन राज्यों और एजेंसियों को भेजा गया नोटिस

मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले में नोटिस जारी किए हैं। नोटिस प्राप्त करने वालों में—

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI)

हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और पंजाब की राज्य सरकारें

पीठ ने साफ कहा कि इन सभी से दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट मांगी जाएगी और सुधारात्मक कदम उठाने की ज़रूरत है।

मुख्य न्यायाधीश की कड़ी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “उत्तराखंड, हिमाचल और पंजाब में हमने अभूतपूर्व भूस्खलन और बाढ़ देखी है। मीडिया रिपोर्ट्स यह दर्शाती हैं कि बाढ़ के पानी के साथ बड़ी मात्रा में लकड़ी बहकर आई। यह साफ संकेत है कि अवैध कटाई हुई है। इस पर तत्काल रोक लगनी चाहिए।” अदालत ने आगे कहा कि सभी संबंधित पक्ष जवाब पेश करें ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

आगे की कार्यवाही

मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी। कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर व्यावहारिक और सख्त कदम सुनिश्चित करें। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जंगलों की कटाई को रोकने और प्राकृतिक ढांचे की रक्षा पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में पहाड़ी राज्यों में आपदाओं की तीव्रता और भी बढ़ सकती है।

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