“सरलता से सुशोभित शिव”

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September 22, 2026

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“सरलता से सुशोभित शिव”

आदि अनंत अविनाशी शिव की महिमा तो सर्वथा विख्यात है। महादेव की संज्ञा से सुशोभित शिव के जीवन में कितनी सरलता है यह तो अवर्णनीय है। कुबेर को लक्ष्मी के खजांची बनाने वाले शिव साधारण वेशभूषा धारण करते है। कर्पूर की तरह गौर वर्ण शिव शरीर पर भस्म रमाते है। प्रायः यह देखा जाता है कि विवाह में दूल्हा स्वयं को अनेक आभूषणों से सुसज्जित करता है, परंतु शिव जैसे सदैव दृष्टिगोचर होते है वैसे ही वह विवाह में सबके समक्ष प्रत्यक्ष हुए। सत्यम शिवम सुंदरम रूप शिव का कल्याण स्वरूप है। शिव का लिंग स्वरूप ब्रह्मांड का प्रतीक है। शिव को संहार का देवता कहा जाता है, परंतु जब कालकूट विष से पृथ्वी पर संकट आया तो उन्हीं महादेव ने विष को ग्रहण कर सभी को चिंता मुक्त किया। शिव ही तो है जिन्होने विष को ग्रहण कर एक और उपनाम नीलकंठ प्राप्त किया। यह वही शिव है जिन्होने श्री हरि विष्णु के कमल अर्पित करने पर उन्हें सुदर्शन चक्र प्रदान किया, जिसका प्रयोग श्री हरि नारायण सृष्टि के कुशल संचालन में करते है।

उमापति महेश्वर शिव सदैव योग एवं ध्यान मुद्रा में ही रहते है, क्योंकि ध्यान ही शांत चित्त एवं आनंद स्वरूप प्रदान करता है। शिव प्रत्येक स्वरूप में अपनी श्रेष्ठता से शोभायमान होते है चाहे वह योगी हो, सन्यासी हो या गृहस्थ। शिव तो ओडर दानी है, अर्थात अनोखे दाता। आशुतोष शिव को प्रसन्न करना भक्त के लिए सबसे सरल है। शिव की सरलता तो उनको अर्पित सामग्री से ही सिद्ध होती है, जो भी सामग्री सरलता से उपलब्ध हो वही शिव को अर्पित कर दो और भोलेनाथ से मनोवांछित फल प्राप्त कर लो। राजा हो या रंक शिव के लिए तो सभी समान है, मात्र जलधारा अर्पित करने से शिव संतुष्ट हो जाते है। यत्र-तत्र उगने वाला धतूरा, आक शिव को समर्पित किया जाता है। शिव की सरलता तो अतुलनीय है। एक बेल पत्र अर्पित करने पर भक्त के तीन जन्मों के पाप हर लेते है। अनायास भी शिव नाम मुख से उच्चारित हो गया तो वही जीवन के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो जाएगा। शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों का स्मरण करने मात्र से सात जन्मों के पाप क्षय हो जाते है।

शिव की प्रतिमा या लिंग स्वरूप के अभाव में पार्थिव शिवलिंग का निर्माण कर पूजन एवं अर्चना कर भी भक्त द्वारा मनोवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है। इतनी सहजता तो अन्यत्र दुर्लभ है, इसलिए चन्द्रशेखर, उमापति अत्यंत वंदनीय है। भक्त ने शिव को जहां विराजमान किया और जो नाम प्रदान किया वह शिव सहर्ष स्वीकार कर लेते है। ज्योतिर्लिंग में भक्तों की तपस्या से उनकी मनोकामना पूर्ति के लिए आशुतोष सदैव प्रत्यक्ष रूप में विराजमान हो गए। राम नाम की अमृत धारा का रसास्वादन करने वाले शिव रामेश्वर एवं गोपेश्वर महादेव के रूप में भी दर्शन देते है। शिव भक्त का कल्याण तो श्री हरि नारायण भी करते है। रावण की शिव भक्ति का ही परिणाम था कि प्रभु श्री राम के हाथों उसे मुक्ति प्राप्त हुई। श्री हरि विष्णु भी कहते है कि जो शिव की आराधना करता है वह नारायण की कृपा का भी भागी होता है क्योंकि हरि और हर एक दूसरे को आराध्य मानते है।

आशुतोष शिव शंकर भोलेनाथ गौरीपति प्रेम की भी उत्कृष्टता सिद्ध करते है। अंतर्यामी शिव सती के हठ को सहज स्वीकार करते है और शक्ति स्वरूपा माँ भगवती को भी कठिन तपस्या से ही प्राप्त होते है। अर्धनारीश्वर स्वरूप में शिव-शक्ति की समानता को उजागर करते है। स्वर्ण भवन निर्माण के पश्चात भी अपने दानी स्वरूप के कारण कैलाश में निवास करते है। सरलता से जीवन को साध्य बनाने वाले शिव की तो महिमा ही न्यारी है। कंठ के भीतर भी विष और बाहर भी विष विद्यमान है, इसके बाद भी वे एकाग्र और ध्यान चित्त दिखाई देते है। ऐसे आनंद स्वरूप भगवान शिव ही हो सकते है। ऐसी गृहस्थी किसकी होगी जिसमें सभी विपरीत स्वभाव वाले पशु-पक्षी सर्प, मोर, चूहा, शेर, बैल यह सभी प्रेम पूर्वक रहते है।

शिव का अनुग्रह यदि जीवन में प्राप्त हो जाए तो जीवन में और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रह जाएगा। हम सदैव जीवन में इच्छाओं और कामनाओं की पूर्ति में लगे रहते है, परंतु उससे कहीं अधिक हम उस ईश्वरीय सत्ता से जुड़कर परम आनंद या अन्तर्मन की प्रसन्नता प्राप्त कर सकते है। शिव ने सब कुछ त्याग कर सरलता को आत्मसात किया। इच्छा मात्र से प्रकट करने वाले भगवान महादेव शिव शंकर त्याग की उत्कृष्टता को स्वीकार करते है। तांडव नृत्य करने वाले नटराज सदैव शांत चित्त स्वरूप में प्रत्यक्ष होकर भक्तों के कल्याण एवं आनंद का मार्ग प्रशस्त करते है। सावन शिव का प्रिय माह है, जहाँ भक्ति का फल भी अनंत गुना हो जाता है, तो क्यों न इस सावन भोलेनाथ से जुड़कर उनके गुणों को आत्मसात कर हम भी जीवन को आनंद स्वरूप बनाएँ।    

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