देश में कोरोना की कड़ी को तोड़ने के लिए 8 हफ्तों का लॉकडाउन जरूरी- आईसीएमआर

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August 12, 2026

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देश में कोरोना की कड़ी को तोड़ने के लिए 8 हफ्तों का लॉकडाउन जरूरी- आईसीएमआर

-आईसीएमआर महानिदेशक डाॅ. बलराम भार्गव ने दी सरकार को सलाह, दिल्ली को खोलना आपदा मोल लेना है
NM News आईसीएमआर महानिदेशक डाॅ. बलराम भार्गव

नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/नई दिल्ली/शिव कुमार यादव/भावना शर्मा/- भारत में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर जमकर कहर बरपा रही है। देश के कई हिस्सों में लॉकडाउन लागू किए जाने के बावजूद संक्रमण के मामलों में कमी नहीं आ रही है। वहीं वैज्ञानिकों ने जल्द ही तीसरी लहर के आने का भी संकेत दे दिया है। इन परिस्थितियों को देखते हुए आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने सुझाव दिया है कि जिन जिलों में संक्रमण के आंकड़े ज्यादा हैं, उन्हें अगले छह से आठ हफ्तों के लिए लॉकडाउन को लागू रखना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि लॉकडाउन प्रतिबंध उन सभी जिलों में लागू होना चाहिए, जहां संक्रमण की दर टेस्ट किए गए लोगों से 10 प्रतिशत से ज्यादा है।
                  बता दें मंगलवार को एक संवाददाता सम्मेलन में डॉ. भार्गव ने कहा, ‘हाई पॉजिटिविटी वाले जिले बंद होने चाहिए। अगर ऐसे जिलों में यदि पॉजिटिविटी रेट 10 से कम होकर 5 फीसद के दर पर आता है, तो उन्हें खोला जा सकता है लेकिन जाहिर तौर पर अगले छह से आठ हफ्तों तक यह संभव नहीं होगा।’ उन्होंने जानकारी दी कि देश में कोरोना संक्रमण की दर 21 प्रतिशत है। 734 में से 310 जिलों में यह दर, देश में कोरोना संक्रमण की दर के या तो बराबर है या उससे ज्यादा है।
                वर्तमान में, भारत के 718 जिलों में से तीन-चैथाई में टेस्ट-पॉजिटिविटी दर 10 प्रतिशत से अधिक है, जिसमें नई दिल्ली, मुंबई और बंगलुरू जैसे प्रमुख शहर शामिल हैं। देश की राजधानी पर बात करते हुए आईसीएमआर प्रमुख मे कहा कि दिल्ली में कोरोना वायरस के मामलों में अब गिरावट देखी जा रही है। यहां एक समय पर पॉजिटिविटी रेट 35 प्रतिशत था जो कि अब घटकर 14 प्रतिशत पर आ गया है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा, ‘अगर दिल्ली को कल खोल दिया गया, तो यह एक आपदा होगी।’
               मालूम हो कि पिछले एक महीने से भारत में कोरोना वायरस की दूसरी लहर का प्रकोप अपने चरम पर है। देश में हर रोज कोविड-19 के साढ़े 3 लाख से ज्यादा मामले और करीब 4 हजार मौतें दर्ज की जा रही हैं। कई विशेषज्ञों का कहना है कि असली आंकड़े इससे कहीं ज्यादा हो सकते हैं।

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