देशभर में एक समान शिक्षा प्रणाली को लेकर हाईकोर्ट ने केंद्र व दिल्ली सरकार से मांगा जवाब

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August 26, 2026

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देशभर में एक समान शिक्षा प्रणाली को लेकर हाईकोर्ट ने केंद्र व दिल्ली सरकार से मांगा जवाब

-आरटीई एक्ट के प्रावधान के खिलाफ दायर पीआइएल पर केंद्र व दिल्ली सरकार को नोटिस जारी
नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/नई दिल्ली/भावना शर्मा/- पूरे देश में एक समान शिक्षा प्रणाली लागू करने को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) 2009 के प्रावधान को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है। इस जनहित याचिका में मदरसों, वैदिक पाठशालाओं और धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाले सभी शैक्षणिक संस्थानों को आरटीई के दायरे में लाने का निर्देश देने की मांग की गई है।
          हाईकोर्ट में जस्टिस डीएन पटेल और जस्टिस ज्योति सिंह की बेंच ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार सहित सभी प्रतिवादियों के जवाब मांगे और मामले को 30 मार्च, 2022 को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया। याचिका में कहा गया है कि धारा 1(4) और 1(5) मदरसों, वैदिक पाठशालाओं और धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाले शैक्षणिक संस्थानों को शैक्षिक उत्कृष्टता से वंचित करती है और शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की संबंधित धाराओं को मनमाना तर्कहीन और संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 21, 21। के उल्लंघन के रूप में घोषित करने का निर्देश देने की मांग की है।
               सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामले की सुनवाई से इनकार करने और याचिकाकर्ता को हाई कोर्ट जाने की सलाह देने के बाद दिल्ली हाई कोर्ट में अश्विनी उपाध्याय द्वारा याचिका दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, हमारी राय है कि याचिकाकर्ता को भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एक याचिका दायर करके उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना चाहिए, जिसमें इस रिट याचिका में सभी बिंदुओं का आग्रह किया गया है। याचिकाकर्ता को इस रिट याचिका को वापस लेने और हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की  अनुमति दी जाती है। हम यह स्पष्ट करते हैं कि हमने मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।
                याचिकाकर्ता ने कहा कि शिक्षा का अधिकार हर बच्चे को स्कूल जाना अनिवार्य बनाता है, लेकिन एक प्रभावी सामान्य पाठ्यक्रम न प्रदान करने से यह बदतर हो गया है। याचिका में आगे कहा गया है कि बच्चों का अधिकार केवल मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा तक ही सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि सामाजिक-आर्थिक धार्मिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर भेदभाव के बिना समान गुणवत्ता वाली शिक्षा तक बढ़ाया जाना चाहिए, इस प्रकार सभी बच्चों के लिए सामान्य पाठ्यक्रम और पाठ्यक्रम आवश्यक है। याचिकाकर्ता ने कहा कि 14 साल तक की सामान्य और अनिवार्य शिक्षा से एक सामान्य संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा, मानव संबंधों में असमानता और भेदभावपूर्ण मूल्यों का ह््रास होगा। यह गुणों को भी बढ़ाएगा और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करेगा, विचारों को ऊंचा करेगा, जो समान समाज के संवैधानिक दर्शन को आगे बढ़ाते हैं।

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