आंवला नवमी: घर में सुख-समृद्धि लाने के लिए आंवला नवमी की उपासना  

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August 20, 2026

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आंवला नवमी: घर में सुख-समृद्धि लाने के लिए आंवला नवमी की उपासना  

इस पर्व का प्रारंभ कार्तिक माह से होता है। यह पूरे एक माह अर्थात पांच सप्ताहों तक चलता रहता है। हर गुरुवार को इसकी पूजा की जाती है। अतः हर गुरुवार आने के पूर्व संध्या पर सभी लोग अपने अपने घरों को लीप पोतकर साफ सुथरा करते हैं एवं घर के कमरों में छूही की माटी से सफेद रंग बनाकर तरह तरह के सजावटी आकृतियां बनाते हैं फिर दूसरे दिन की पूजा पाठ की तैयारियां करते हैं। कहा जाता है कि कार्तिक माह के लगते ही आंवला का दान करना बहुत पुण्य देता है। इस संदर्भ में एक पुरानी कहानी बताई जाती है कि जो इस प्रकार है -किसी समय एक गांव में एक बुढ़िया रहती थी। उसके चार बेटे व चार पुत्रियां था। उस बुढ़िया के घर में आंवले का बहुत बड़ा पेड़ था। जिसमें फलने वाले आंवला को हमेशा वह ‘दूसरों को देती रहती थी। दान पुण्य करने में बुढ़िया कभी पीछे नहीं रहती थी। इस आदत को देखकर उसकी बहुएं उससे बहुत चिढ़ा करती थी एवं आंवला दान करने से हमेशा मना करती थी एक दिन बहुओं ने उसे घर से निकाल दिया। बुढ़िया मजबूर होकर आंटे के छोटे छोटे (आंवले ) गोले बनाकर दान करने लगी। व हमेशा भगवत पूजा पाठ में ध्यान लगाती रही। उसके इसी भक्ति भावना और साधना से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु एक दिन प्रगट होकर उसे कहते हैं-“मैं तुम्हारी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूं! ” और भगवान की कृपा से उस बुढिया की झोपड़ी महल में बदल जाती है। जहां अनेक नौकर चाकर, धन, सोना चांदी अनेक कीमती आभूषण सभी कुछ था । बुढ़िया अपने महल में पूरी सुख सुविधा के साथ भगवत् पूजा में रम गयी। उधर उसके चारों बेटों का कारोबार ठप हो गया। चारों बहुएं दाने दाने को मोहताज हो गईं। अपनी गरीबी की हालत के कारण बहुओं को भी घर से निकल कर काम ढूंढना पड़ गया। संयोग से एक बहू अपने सास के महल में ही काम मांगने पहुंची। बुढ़िया ने अपनी बहू  को तुरंत पहचान लिया और उसे अपने महल में नौकरानी रख लिया। बुढ़िया की बहु उसे नहीं पहचान पाई। एक दिन बुढ़िया ने उसे पैर दबाने को कहा तब पैर दबाते वक्त वह नौकरानी बुढ़िया के पैर में तिल देखकर रोने लगी। बुढ़िया ने उससे पूछा कि क्यों रो रही है तब उसने कहा मेरी सास के पैर में भी इसी प्रकार का तील था जब से हमने उन्हें घर से भगा दिया, तब से हमारे घर में दरिद्रता आ गई है। बुढ़िया ने आगे पूछा- क्या तुम लोगों ने अपनी सास को कोई खोज खबर ली है? तब बहु ने उत्तर दिया कि हम लोगों ने उन्हें बहुत ढूंढा, पर वे नहीं मिली। आखिरकार बुढ़िया को अपनी बहु पर दया आ गई, फिर उसने अपना भेद खोलते हुये उसे बताया कि मैं ही तुम्हारी वो सास हूं। उसकी बहु यह जानकर उससे अपने किये की माफी मांगने लगी। बुढ़िया ने उन्हे माफ कर दिया। और सभी बेटे बहुओं को बुलाकर अपने साथ रख लिया। उनका घर फिर एक बार खुशियों से भर गया। बस तभी से इस आंवला नवमी की पूजा घर की सुख समृद्धि एवं शांति के लिये की जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस पूजा को पूरे विधि व नियम पूर्वक करने पर ही अभिष्ठ फल की प्राप्ति होती है। इस पूजा में सबसे आवश्यक माना गया है कार्तिक से ही आंवले का दान करना। जिस दिन आंवला नवमीं की तिथि रहे, उस दिन प्रातः से ही स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर आंवले के पेड़ की विधिपूर्वक पूजा अर्चना करें। पहले जल अर्पित करें फिर चंदन, रोली आदि लगायें। घी का दीपक जलाएं एवं फूल फल चढ़ाकर हाथा दिया जाता है। इसके बाद आंवला पेड़ के तनों को दोनों हाथों में भरकर गले (भेंट) मिलने की प्रक्रिया की जाती है। फिर अपनी छमतानुसार 108, 51, 21, 11 एवं 7 बार पेड़ के चारों ओर फेरी लगाकर मंत्रोच्चार करते हुए रोली लपेटा जाता है। अंत में यह नियम है कि आंवला पेड़ के नीचे भोजन पकाकर लोगो को खिलाये एवं स्वयं भोजन करें। पेड़ के नीचे भोजन पकाने एवं भोजन करने को अत्यंत शुभ माना जाता है। किसी पुरोहित को दान दक्षिणा (सीधा) देने का भी विधान है। इस प्रकार आंवला नवमी की पूजा संपन्न की जाती है। इस पूजा के करने से घर में सुख शांति और सम्पन्नता बढ़ती है।

     सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"

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