सुपरबग्स को खत्म करेगी नई एंटीबायोटिक दवा, 70 लाख लोगों की बच सकेगी जान

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सुपरबग्स को खत्म करेगी नई एंटीबायोटिक दवा, 70 लाख लोगों की बच सकेगी जान

-ब्रिटेन के वैज्ञानिको ने सुपरबग्स को मारने वाली एंटीबायोटिक टिक्सोबेक्टिन का सिंथेटिक प्रारूप बनाया

नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/ब्रिटेन/शिव कुमार यादव/- विश्व में जानलेवा साबित हो रही सुपरबग्स को अब खत्म करने के लिए ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने नई दवा खोज ली है। इस खोज से हर साल सुपरबग्स से जान गवाने वाले करीब 70 लाख लोगों की जान को बचाया जा सकेगा। सुपरबग्स वे बैक्टीरिया होते हैं जिन पर एंटीबायोटिक के ज्यादा या गलत तरीके से लेने के कारण असर होना बंद हो जाता है। लेकिन अब ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने अब एक रिसर्च में सुपरबग्स को मारने वाला एंटीबायोटिक खोज लिया है। जिससे करोड़ों लोगों को इस बिमारी से बचाया जा सकेगा।

यहां बता दें कि बैक्टीरिया प्रतिरोधक क्षमता बना लेते हैं और कोरोना के बाद यह समस्या गंभीर हो चली थी। कोविड के दौरान लोगों को कई तरह के एंटीबायोटिक्स दिए गए, जिनका वायरस पर कोई असर नहीं होता है। इसके चलते सुपरबग्स से जान गंवाने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है। जिसकारण हर साल 70 लाख लोग सुपरबग्स के कारण मर रहे थे और यही हाल रहा तो 2050 तक हर साल 1 करोड़ लोगों के मरने की संभावना व्यक्त की गई थी। ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने अब एक रिसर्च में सुपरबग्स को मारने वाला एंटीबायोटिक खोज लिया है। यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल की रिसर्च में सामने आया है कि इस ड्रग ने चूहों में किसी भी स्वस्थ टिशू को नुकसान पहुंचाए बिना सुपरबग्स को खत्म कर दिया है। कई दशकों में खोजा गया यह पहला एंटीबायोटिक टिक्सोबेक्टिन का सिंथेटिक रूप है। इंग्लैंड सरकार के एक कमीशन ने अनुमान लगाया है कि 2050 तक सुपरबग्स के कारण हर साल और 1 करोड़ लोगों की जान जा सकती है।

रिसर्च के मुताबिक टिक्सोबेक्टिन चूहों में एमआरएसए नाम के सुपरबग को मारने में सफल रहा, जिस पर अब तक कई सारी एंटीबायोटिक बेअसर साबित हुई हैं। यह इंसानों में पाए जाने वाले कई बैक्टीरिया को मारने में भी सफल रहा है। इसे सुपरबग्स के खिलाफ आखिरी बचाव के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। टिक्सोबेक्टिन को कमरे के सामान्य तापमान में रखा जा सकता है। इसके चलते इसे आसानी से दुनिया भर में भेजा जा सकेगा।

2015 में अमेरिका के मेन राज्य में इस ड्रग के बारे में पता चला था। तब आम जनता को इसके बारे में नहीं बताया गया क्योंकि इसका उत्पादन बहुत महंगा था। अब वैज्ञानिकों ने 2000 गुना कम लागत में इसका सिंथेटिक रूप बनाने में सफलता पा ली है। अब बड़ी मात्रा में टिक्सोबेक्टिन बनाई जा सकेगी।

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