रामनवमी के अवसर पर कलमवीर विचार मंच ने किया काव्योत्सव का आयोजन

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October 27, 2026

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रामनवमी के अवसर पर कलमवीर विचार मंच ने किया काव्योत्सव का आयोजन

-काव्योत्सव में कवियों ने भगवान राम के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अपनी रचनाओं से किये शब्द पुष्प अर्पित
नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/नई दिल्ली/भावना शर्मा/- कलमवीर विचार मंच द्वारा श्री रामनवमी के उपलक्ष्य में सेक्टर 9 स्थित कृष्ण कुंज में काव्योत्सव का आयोजन किया गया। दिल्ली के प्रसिद्ध कवि मनीष मधुकर के सानिध्य में हुए इस कार्यक्रम का संचालन युवा शिक्षाविद सुनीता सिंह ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता क्षेत्र के वरिष्ठ रचनाकार सतपाल स्नेही ने की। इस अवसर पर उपस्थित विरेन्द्र कौशिक, कुमार राघव व अनिल भारतीय ने भी भगवान राम को अपने शब्द पुष्प अर्पित करने के अलावा जीवन के विभिन्न पहलुओं पर आधारित अपनी रचनाओं से मंत्रमुग्ध किया।
             कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत कर रहे दिल्ली से पधारे कवि मनीष मधुकर को संस्था द्वारा शाल व अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया गया। मधुकर ने भरत की पत्नी माण्डवी सहित रामायण और महाभारत के पात्रों पर आधारित अपनी रचनाओं से खूब वाहवाही बटोरी। स्नेही जी के काव्य पाठ व अध्यक्षीय संबोधन के साथ रात नौ बजे तक चले इस काव्योत्सव का समापन हुआ। काव्योत्सव में प्रस्तुत कुछ रचनाओं की बानगी देखिए…

मैने जब भी जीना चाहा नेह के एहसास को,
राम की तरह मुझे जाना पड़ा बनवास को।
स्वर्ण की शैय्या को तजकर, बस बिछा कर घास को,
 राम जी सोये धरा पर ओढ़कर आकाश को।
-मनीष मधुकर

हरदम ऊँचे-ऊँचे परबत-सी बातें करता रहता है,
कंकर-पत्थर क्या बोलेंगे,ये तो सोच लिया कर तू।
-सतपाल स्नेही

लोग जो बदशक्ल होते जा रहे हैं,
आईना वो कौम को दिखला रहे हैं।
रेत में कश्ती चलायेंगे वही अब,
जो मरुस्थल को नदी बतला रहे हैं।
-कृष्ण गोपाल विद्यार्थी

कभी-कभी तो ये सवाल,
मन को बहुत सताता है।
राम का नाम अधिकांश लोगों को
बुरे वक़्त में ही क्यों याद आता है?
-वीरेन्द्र  कौशिक

मेरे प्यारे से बचपन में, लम्हें अनमोल हजार मिले,
कुछ रूठे, कुछ बिछड़ गए, कुछ सात समंदर पार मिले।
-सुनीता सिंह

पुष्प वाटिका के सभी काम नहीं आएंगे,
पर्वती पाषाण सभी धाम नहीं पाएंगे।
उम्र ये गुजारो चाहे मंदिरों की चौखटों पे,
कर्म बिना हिस्से में राम नहीं आएंगे।
-कुमार राघव

गुमनामी में बीती पुश्तें, सदियों से “गुमनाम“ रहा,
भीतर तेरे राम बिराजे उनसे भी अनजान रहा।
-अनिल भारतीय “गुमनाम“

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