ब्राउजर में एपल-गूगल की बादशाहत होगी खत्म, भारतीय यूजर्स को मिलेगा अपना ब्राउजर

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August 1, 2026

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ब्राउजर में एपल-गूगल की बादशाहत होगी खत्म, भारतीय यूजर्स को मिलेगा अपना ब्राउजर

-भारत सरकार ने खुद का वेब ब्राउजर लॉन्च करने की घोषणा की

नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/नई दिल्ली/शिव कुमार यादव/- वेब या इंटरनेट ब्राउजर में अमेरिकी कंपनियों का दबदबा है। इसमें भी गूगल क्रोम और एपल सफारी बादशाहत जग जाहिर है। ऐसा नहीं है कि भारतीय टेक कंपनियों के पास अपने ब्राउजर नहीं है लेकिन जब बात इस्तेमाल की आती है तो उसमें गूगल क्रोम और एपल सफारी ही बाजी मारते हैं। अब एपल और गूगल की बादशाहत खत्म होने वाली है। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि भारत सरकार खुद के वेब ब्राउजर को लॉन्च करने की तैयारी कर रही है। इसके लिए वेब ब्राउजर चैलेंज की घोषणा की गई है।


                  सरकार ने रक्षा, आईटी हार्डवेयर और फार्मा में स्वदेशी क्षमता विकास पर जोर देने के लिए एक भारतीय वेब ब्राउजर विकसित करने के लिए एक ओपन चैलेंज प्रतियोगिता शुरू की है। नई दिल्ली में भारतीय वेब ब्राउजर डेवलपमेंट चैलेंज में प्रमाणन प्राधिकारियों के नियंत्रक अरविंद कुमार ने कहा, “अब समय आ गया है कि आभासी दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण हथियार, वेब ब्राउजर, भारत में विकसित किया जाए।“

अमेरिकी कंपनियों का दबदबा?
भारतीय बाजार में वेब ब्राउजर के क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियों का दबदबा है। गूगल क्रोम से लेकर फॉयरफाक्स और एपल सफारी तक अमेरिकी कंपनियों के ब्राउजर हैं और इनके साथ डाटा लीक का खतरा है, क्योंकि इनके सर्वर भारत से बाहर ही हैं। आईडब्ल्यूबीडीसी में हिस्सा लेने के लिए कोई भी स्टार्टअप अप्लाई कर सकता है। सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (सीडीएसी), बेंगलुरु को इस प्रतियोगिता के लिए एंकर एजेंसी के रूप में नियुक्त किया गया है।
                 सीडीएसी के कार्यकारी निदेशक एसडी सुदर्शन ने कहा, “भारत इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की सबसे बड़ी संख्या वाले देशों में से एक है और यहां विदेशी कंपनियों का कब्जा है। ऐसे में ब्राउजर के सर्च रिजल्ट को ये कंपनियां अपने हिसाब से बदल सकती हैं। इसके अलावा कैशे और कुकीज डाटा की मदद से यूजर्स को ट्रैक भी किया जा सकता है जो कि उचित नहीं है। विदेशी ब्राउजर के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे रूट स्टोर में भारतीय प्रमाणन एजेंसियों को शामिल नहीं करते हैं। रूट स्टोर को ट्रस्ट स्टोर कहा जाता है, जिसमें ऑपरेटिंग सिस्टम और एप्लीकेशन की जानकारी दी जाती है कि वो सुरक्षित हैं या नहीं? इसी वजह से खुद का ब्राउजर तैयार करने का फैसला लिया गया है।

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