प्रेम पच्चीसा ( भाग 2 )

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August 19, 2026

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प्रेम पच्चीसा ( भाग 2 )

बिलासपुर, छत्तीसगढ़/-   हालात का मारा रोहन जिसे लोग कवि, कहने लगे थे। बिड़ला मंदिर के आसपास गरीब बस्ती में तंगहाल रहता पर उसका मन कविताओं का सागर था। वह दिन-रात कागज और कलम के साथ बिताता, अपनी कविताओं में प्रेम, प्रकृति और जीवन की गहराइयों को उकेरता। उसकी कविताएँ गाँव वालों के बीच मशहूर थीं, पर उसकी जेब हमेशा खाली रहती। उसकी प्रेमिका दीपा एक खूबसूरत और आकर्षक युवती जिसकी आँखों में सरकारी नौकरी की चमक  और  दिल महत्वाकांक्षाओं से भरा था। वह हमेशा वैभव और ऐश्वर्य की चाह रखती थी।
      रोहन  और दीपा  की मुलाकात  नौ महीने बाद हुई थी, रोहन पुरानी सब बातें भूलकर अपनी कविताएँ सुना रहा था। दीपा उसकी कविताओं की गहराई से प्रभावित होकर भी मानसिक रूप से रोहन के साथ नहीं थी। ऊपरी तौर पर हंस रही थी। सीधा सरल रोहन अपनी हर कविता दीपा को समर्पित करता। वह उसे भारत भवन तालाब के किनारे बिठाकर अपनी रचनाएँ सुनाता, और दीपा रोहन का मन रखने के लिए तालियाँ बजाकर उसका हौसला बढ़ाती। पर जैसे-जैसे समय बीता, दीपा की नजरें रोहन की सादगी से हटकर शहर के चमक-दमक की ओर मुड़ने लगीं।

वह रोहन से कहती, “तुम्हारी कविताएँ तो सुंदर हैं, पर इनसे क्या होगा? हमें एक बड़ा घर चाहिए, अच्छे कपड़े चाहिए, सम्मान चाहिए। रोहन  अपने प्रेम में डूबा था, दीपा  की बातों को अनसुना कर देता। वह सोचता कि उसका प्रेम ही दीपा के लिए काफी है पर दीपा का मन अब बदल चुका था। एक दिन उसके ऑफिस में एक वरिष्ठ अधिकारी  रमेश से उसकी भेंट हुई। वह दीपा  की सुंदरता पर रमेश मोहित हो गया और उसे शादी का प्रस्ताव दे डाला।

रमेश ने दीपा को वैभवशाली जीवन का वादा किया—बड़ा घर, नौकर-चाकर, और सुख-सुविधाएँ। कुछ समय बाद  दीपा ने  रोहन  से कहा -तुम मुझे सिर्फ कविताएँ दे सकते हो, पर रमेश मुझे दुनिया दे सकता है। “मैं तुमसे प्यार करती हूँ, पर मैं अपनी जिंदगी को गरीबी में नहीं बिता सकती”। यह सुनकर रोहन का दिल टूट गया। उसने दीपा को रोकने की कोशिश की अपनी सबसे सुंदर मार्मिक कविता उसे सुनाई, जिसमें उसने अपने प्रेम की गहराई बयाँ की पर दीपा  का स्वार्थी मन नहीं पिघला वह रोहन को उसी हाल में छोड़कर रमेश के साथ चली गई।

रोहन ने उस रात तालाब के किनारे बैठकर अपनी आंसुओं में डूबी  बिरहा कविता लिखी, जिसमें उसने दीपा के लिए अपने प्रेम को तो बयाँ किया पर साथ ही यह भी लिखा कि “सच्चा प्रेम स्वार्थ से परे होता है”। उसकी कविता गाँव में फैल गई, और लोग उसकी गहराई में खो गए। धीरे धीरे रोहन मंचीय कवि होकर नाम इज्ज़त के साथ सम्मान राशि पा रहा था। दूसरी तरफ दीपा को रमेश के साथ सुख तो मिला, पर वह सच्चा प्रेम और सम्मान जो रोहन की कविताओं में था, वह उसे कभी नहीं मिला। सारी जिन्दगी गाड़ी,बंगला,होटल , मॉल में सुख और संतुष्टि तलाशती रही।

रोहन अपनी कविताओं में जीने लगा, और उसकी रचनाएँ दूर-दूर तक मशहूर हुईं। दीपा ने सालों बाद रोहन की एक कविता सुनी, और उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसे एहसास हुआ कि उसने सच्चे प्रेम को खो दिया था, सिर्फ चमक-दमक के पीछे भागकर,,,।

राजेन्द्र रंजन गायकवाड़
सेवानिवृत्त, केंद्रीय जेल अधीक्षक 

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