प्रवासी भारतीय भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़

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August 18, 2026

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नई दिल्ली/उमा सक्सेना/-    राम जानकी संस्थान (आरजेएस) पॉजिटिव ब्रॉडकास्टिंग हाउस (पीबीएच) के 514वें अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में प्रवासी भारतीयों की भूमिका पर विस्तार से चर्चा हुई। कार्यक्रम के सह-आयोजक भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) और विदेश मंत्रालय की ओर से कार्यक्रम निदेशक सुनील कुमार सिंह ने मुख्य वक्ता के रूप में बताया कि विश्वभर में बसे करीब 3.5 करोड़ भारतीय प्रवासी न सिर्फ भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहे हैं, बल्कि गरीबी उन्मूलन और सामाजिक स्थिरता में भी अहम योगदान निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रवासियों द्वारा भेजी जाने वाली रेमिटेंस और निवेश से भारत की जीडीपी में लगभग तीन प्रतिशत तक की भागीदारी होती है।

प्रवासी अब सिर्फ श्रमिक नहीं, भारत के रणनीतिक साझेदार
अपने संबोधन में सुनील कुमार सिंह ने स्पष्ट किया कि अनिवासी भारतीयों को अब केवल विदेशों में कार्यरत नागरिकों के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि वे भारत के रणनीतिक सहयोगी और सांस्कृतिक दूत बन चुके हैं। उन्होंने बताया कि आईसीसीआर विश्व के विभिन्न देशों में 38 सांस्कृतिक केंद्रों के माध्यम से भारतीय संस्कृति और कूटनीतिक रिश्तों को सशक्त कर रहा है। उनका कहना था कि प्रवासी भारतीय वैश्विक मंचों पर भारत की आवाज को मजबूती से प्रस्तुत कर रहे हैं।

सकारात्मक मीडिया आंदोलन के 11 वर्ष पूरे
आरजेएस पीबीबी के संस्थापक एवं राष्ट्रीय संयोजक उदय कुमार मन्ना ने ‘ग्लोबल नेटवर्किंग फॉर पॉजिटिव चेंज’ विषय पर सत्र की शुरुआत करते हुए बताया कि सकारात्मक मीडिया आंदोलन अपने 11वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। उन्होंने कहा कि ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के तहत प्रवासी भारतीयों के योगदान को पुस्तकों और दस्तावेजों के माध्यम से संरक्षित किया जा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके योगदान को समझ सकें।

प्रवासी परिवारों की सामाजिक चुनौतियों पर चर्चा
वेबिनार में ‘इंस्पायरिंग इंडियन वुमन’ की संस्थापक निदेशक रश्मि मिश्रा ने प्रवासियों से जुड़ी सामाजिक समस्याओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विदेशों में बसे भारतीयों के लिए भारत में रह रहे माता-पिता की सुरक्षा, स्वास्थ्य और संपत्ति की चिंता हमेशा बनी रहती है। उन्होंने पैतृक संपत्तियों की सुरक्षा के लिए मजबूत संस्थागत व्यवस्था की जरूरत बताई और ‘सर्कुलर माइग्रेशन’ यानी स्वदेश वापसी की अवधारणा पर जोर दिया।

संस्कृति के असली संवाहक हैं प्रवासी भारतीय
जर्मनी के बर्लिन से जुड़ी लेखिका और कवयित्री डॉ. योजना शाह जैन ने कहा कि विदेशों में रह रहे भारतीय अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों के सच्चे संरक्षक हैं। उन्होंने बताया कि प्रवासी समुदाय आज भी भारतीय वेशभूषा, त्योहारों और भाषा को जीवित रखे हुए है, जो उनकी जड़ों से गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।

आध्यात्मिक संतुलन से मजबूत होता है वैश्विक नेटवर्क
ऑस्ट्रेलिया से जुड़ी लेखिका एवं शोधकर्ता डॉ. श्वेता गोयल ने कहा कि वैश्विक नेटवर्किंग तभी सफल हो सकती है, जब व्यक्ति आंतरिक रूप से संतुलित हो। उन्होंने भगवद गीता को आधुनिक जीवन में मानसिक प्रबंधन का प्रभावी साधन बताया।

‘अतिथि देवो भव’ से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ तक
कार्यक्रम की मॉडरेटर और वरिष्ठ पत्रकार याशिका मित्तल ने अपने विदेश से भारत लौटने के अनुभव साझा करते हुए कहा कि प्रवासी भारतीय भारतीय पहचान के मजबूत स्तंभ हैं। अन्य वक्ताओं ने भी ‘अतिथि देवो भव’ की भावना को दोहराया और आरजेएस नेटवर्क को एक वैश्विक परिवार बताया।

2047 के विकसित भारत की ओर सकारात्मक संकल्प
दो घंटे चले इस मैराथन वेबिनार के समापन पर उदय कुमार मन्ना ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के संकल्प को दोहराते हुए कहा कि सकारात्मक सोच, मीडिया साक्षरता और सांस्कृतिक जुड़ाव के माध्यम से भारत 2047 तक एक विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा। उन्होंने 17 जनवरी को अपने जन्मदिन को सकारात्मक आंदोलन के नए संकल्प दिवस के रूप में मनाने की घोषणा भी की।

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