पेड़ के पीछे छिपकर सीखा वुशु, अब है 37वें राष्ट्रीय खेल की गोल्ड मेडलिस्ट

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पेड़ के पीछे छिपकर सीखा वुशु, अब है 37वें राष्ट्रीय खेल की गोल्ड मेडलिस्ट

मानसी शर्मा /-   37वें राष्ट्रीय खेलों में राजधानी दिल्ली की मुंकुंदपुर निवासी रेजिना तामांग ने वुशु  खेल में गोल्ड मेडल जीता है। रेजिना ने वुशु के नानचुवान इवेंट्स में यह उपलब्धि हासिल की, जबकि दिल्ली टीम ने इन राष्ट्रीय खेलों में 2 गोल्ड, 1 सिल्वर और 8 ब्रॉन्ज सहित कुल 11 मेडल अपने नाम किए। रेजिना ने राष्ट्रीय खेलों में पहली बार हिस्सा लिया था और पहली बार में ही वह गोल्ड मेडल हासिल करने में कामयाब रही, वैसे वह 2012 से नेशनल चैंपियनशिप में चैंपियन बनती आ रही है और विभिन्न प्रतियोगिताओं में उसके नाम 4 दर्जन से भी अधिक मेडल हैं। इस उपलब्धि के पीछे उसका संघर्ष और कड़ी मेहनत है। रेजिना ने वुशु की कला पार्क में पेड़ के पीछे छिपकर सीखी और इस खेल को करियर बनाने के लिए रेग्युलर पढ़ाई भी छोड़ दी थी। रेजिना के नाम जूनियर एशियन चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल भी है। वुशु टीम के कोच राजबीर सिंह का कहना है कि रेजिना में अलग ही टैलेंट है, अगर उसे सही प्रकार से ट्रेनिंग मिलती रहे तो वह इंटरनेशनल स्तर पर भी देश के लिए बहुत सारे मेडल जीत सकती है।
पैसों के लिए कोचिंग देने की थी प्लानिंग

रेजिना से बातचीत में उसने बताया कि उनके मुंहबोले मामा मोनी लामा वुशु में माहिर थे। वह मॉडल टाउन स्थित एक पार्क में कुछ बच्चों को वुशु सिखाते थे। जब वह 11 साल की थीं तो उनके घर की माली हालत बहुत ही खराब थी। घर चलाने के लिए उन्होंने वुशु की ट्रेनिंग देकर पैसा कमाने की प्लानिंग बनाई। इसके लिए ही पार्क में छिपकर इस वृद्ध कला को सीखा। एक दिन पार्क में अभ्यास के दौरान मामा ने उसे पकड़ लिया और  क्लास लगाई। बाद में मामा ने उसे ट्रेंड किया और कई जगह से स्कॉलरशिप भी दिलाई। उसने बताया कि उनका भाई शशि तामांग भी उनके साथ ही इसी तरह वुशु सीखा है। उसके पास भी काफी मेडल हैं और वह अब कोचिंग भी दे रहा है। वह अपने मामा को ही अपना मेंटर मानते हैं।  

स्कॉलरशिप के पैसे देख रो पड़े थे पापा

दोनों के पिता किशन तमांग एक कैटरिंग वाले के यहां काम करते है। वह बताते हैं कि इन दोनों ने कब यह खेल सीखा, इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है। लेकिन जब पहले गोल्ड मेडल से प्राप्त स्कॉलरशिप से मिले पैसे दोनों ने मेरे हाथ में दिए तो मेरी आंखें भर आई। उस वक्त घर की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। दोनों को स्कॉलरशिप के सवा लाख रुपये मिले थे। दरअसल, दिल्ली सरकार सब-जूनियर – जूनियर खिलाड़ी को गोल्ड मेडल पर 42 हजार रुपए स्कॉलरशिप देती है। 

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