
नई दिल्ली/- दिल्ली में नगर निगम की परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। इसे लेकर अधिसूचना भी जारी हो चुकी है। दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष अनिल कुमार ने दिल्ली नगर निगम परिसीमन को लेकर जारी अधिसूचना को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। कांग्रेस का आरोप है कि दलितों, अल्पसंख्यकों के अधिकारों तथा वार्डों में जनसंख्या फार्मूले का दुरुपयोग हुआ है। इसपर शुक्रवार को सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने केंद्र और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर तय की गई है।

हालांकि परिसीमन की अधिसूचना के बाद यह प्रबल संभावना बन गई थी कि केंद्र सरकार दिल्ली नगर निगम के चुनाव दिसंबर के पहले सप्ताह में करायेगी। लेकिन अब हाईकोर्ट में मामला पंहुच जाने और कोर्ट द्वारा 14 दिसंबर की अगली तारीख देने के बाद यह तो तय हो गया है कि दिसंबर के मध्यांहन तक चुनाव नही होने वाले है।
कांग्रेस ने दिल्ली के सीएम पर लगाए आरोप
प्रदेश अध्यक्ष अनिल चौधरी ने बुधवार को पत्रकार वार्ता में कहा कि यह रिपोर्ट भाजपा की जीत सुनिश्चित करने के लिए आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल की मौन सहमति से बनाई गई है, जिसका कांग्रेस विरोध करती है। उन्होंने कहा कि मूल अवधारणा और किए गए वायदों से अलग लोकतांत्रिक मूल्यों को ताक पर रख बनाई गई परिसीमन रिपोर्ट में वार्डों में जनसंख्या समीकरण का उल्लंघन, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय को अलग-थलग करके नियमों की पूरी तरह से अवहेलना की गई है।
कांग्रेस ने परिसीमन रिपोर्ट को बताया भाजपा-आप की मिलीभगत
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अनिल चौधरी का कहना है कि आम आदमी पार्टी की केजरीवाल सरकार ने परिसीमन रिपोर्ट को ड्राफ्ट रिपोर्ट की तरह जस का तस ही बनाकर जनता के सामने पेश कर दिया। दिल्ली कांग्रेस ने कहा कि दिल्ली कांग्रेस ने ड्राफ्ट परिसीमन की गहन समीक्षा करके चुनाव आयोग के समक्ष 168 शिकायत/सुझाव जमा किए थे, लेकिन चुनाव आयोग ने उन पर कोई विचार नहीं किया और गृह मंत्रालय को भेज दिया। कांग्रेस का आरोप है कि परिसीमन रिपोर्ट पूरी तरह भाजपा और आम आदमी पार्टी की रिपोर्ट है।
चुनाव में अल्पसंख्यकों की भूमिका खत्म करने की साजिश
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि परिसीमन में 22 वार्ड कम किए हैं, उसके लिए सभी 70 विधानसभाओं का स्वरुप बदलना किसी न किसी साजिश के तहत किया गया है। परिसीमन में दलित और अल्पसंख्यक बहुल वार्डों में उनकी जनसंख्या को छिन्न-भिन्न करके इन समुदायों को कमजोर करके इनके वोट के महत्व को खत्म करने की कोशिश की गई है। साथ ही अल्पसंख्यकों की जनसंख्या को विधानसभा के अंदर इस प्रकार से समायोजित किया है ताकि यह समुदाय चुनाव में निर्णायक भूमिका न निभा सके।





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