छठ पूजा 2025: आस्था, तपस्या और सूर्य उपासना का चार दिवसीय महापर्व

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October 8, 2026

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छठ पूजा 2025: आस्था, तपस्या और सूर्य उपासना का चार दिवसीय महापर्व

नई दिल्ली/उमा सक्सेना/-    छठ पूजा भारतीय संस्कृति का एक ऐसा पर्व है जो आस्था, शुद्धता और प्रकृति की उपासना का अद्भुत संगम है। यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित होता है। कहा जाता है कि सूर्य की उपासना से जीवन में ऊर्जा, स्वास्थ्य और समृद्धि आती है। छठ पर्व की शुरुआत दीपावली के बाद होती है और यह चार दिनों तक चलता है। इस दौरान व्रती कड़े नियमों और संयम का पालन करते हैं।

छठ पूजा 2025 की तिथियां
25 अक्टूबर (शनिवार) – नहाय-खाय

26 अक्टूबर (रविवार) – खरना

27 अक्टूबर (सोमवार) – संध्या अर्घ्य

28 अक्टूबर (मंगलवार) – उषा अर्घ्य

नहाय-खाय: शुद्ध आरंभ
छठ महापर्व का पहला दिन नहाय-खाय कहलाता है। इस दिन व्रती स्नान कर शरीर और मन को शुद्ध करते हैं। घरों में लौकी-भात और चने की दाल का प्रसाद बनाया जाता है। इसे ग्रहण करने के बाद व्रती आने वाले कठिन उपवास के लिए खुद को तैयार करते हैं।

खरना: उपवास और श्रद्धा का संगम
दूसरे दिन को खरना कहा जाता है। व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं और शाम को गुड़ की खीर, रोटी और फलों का प्रसाद तैयार करते हैं। सूर्यास्त के बाद यह प्रसाद छठी मैया को अर्पित किया जाता है। पूजा के बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं, इसके साथ ही 36 घंटे का निर्जला व्रत आरंभ होता है।

संध्या अर्घ्य: डूबते सूर्य की आराधना
तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को संध्या अर्घ्य दिया जाता है। इस अवसर पर घाटों और नदियों के किनारे भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। महिलाएं सिर पर पूजा की टोकरी लेकर गीत गाते हुए जल में खड़ी होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करती हैं। यह क्षण भक्ति, संगीत और आस्था से परिपूर्ण होता है।

उषा अर्घ्य: उगते सूर्य को नमन
छठ पूजा का अंतिम दिन उषा अर्घ्य का होता है। व्रती उगते सूर्य को जल अर्पित कर अपने व्रत का समापन करते हैं। यह क्षण पूरे पर्व का सबसे पवित्र और भावनात्मक पल होता है। व्रती अपने परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और संतान की दीर्घायु की कामना करते हैं। इसके बाद व्रत का पारण किया जाता है और प्रसाद बांटा जाता है।

छठ: लोक आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक
छठ पूजा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सामाजिक एकता और पर्यावरण के प्रति सम्मान का प्रतीक भी है। इस पर्व में कोई भेदभाव नहीं होता — हर व्यक्ति सूर्य देव के समक्ष समान भाव से खड़ा होता है। यह पर्व सिखाता है कि प्रकृति की पूजा ही मानवता का आधार है।

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