“असाध्य को साध्य बनाते श्री राम”

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August 20, 2026

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राम नाम की महिमा तो देवाधिदेव महादेव से श्रेष्ठ कोई भी व्यक्त नही कर सकता, जो गृहस्थ जीवन में माता उमा सहित प्रभु राम की आराधना में लीन रहते है। महादेव ने सिर्फ राम नाम को रखकर बाकी सभी वितरित कर दिया था। भगवान श्री राम के प्रति महादेव का प्रेम इतना अद्भुत है कि वे राम नाम श्रवण के लिए शमशान में निवास करते है। वे माता पार्वती को विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने पर बताते है कि है देवी राम नाम विष्णु सहस्त्रनाम के तुल्य है। मैं सर्वदा राम नाम में ही रमन करता हूँ। महादेव ने अपने 11वें रुद्र अवतार में भी श्री राम के प्रति अपना अनन्य प्रेम और भक्ति प्रदर्शित की। हनुमान सदैव श्री राम के सानिध्य में रहना चाहते है। राम भक्ति में ही वे आनंद के अभिभूत रहते है।

भगवान राम के अवतरण में असाध्य को साध्य बनाने का अनूठा रहस्य छुपा है। भगवान श्री राम के जीवन में धैर्य सबसे अनूठा मूल मंत्र रहा है, जो नारायण स्वरूप श्री राम पलक झपकते ही सृष्टि का सर्वस्व परिवर्तित कर सकते थे, उन्होने श्रीराम बनकर छोटे-छोटे कार्यो को संपादित कर अपने लक्ष्य को साधा। जिनकी सेवा में समस्त सृष्टि सेवारत रहती है उन्होने राम से श्रीराम बनने की यात्रा में सहजता, सरलता और त्याग को अपनाकर छोटे-छोटे संसाधन जुटाकर उन संसाधनों से विजय को प्राप्त करना सिखाया। दुनिया अक्सर असमानता के भाव से दूसरों को न्यून समझकर अस्वीकार करती है, वहीं श्रीराम ने वानर सेना का सहयोग लेकर दुनिया को सफलता का मूल मंत्र सिखाया कि हर कोई स्वयमेव श्रेष्ठ होता है।

श्रीराम के चरित्र में हमें रणभूमि के साथ मनभूमि पर भी विजय प्राप्त करने का संदेश मिलता है। जिन सीता माता के श्रीराम वन-वन भटके, जिनको रावण की कैद से मुक्त करवाने के लिए श्रीराम ने युद्ध तक का मार्ग तय किया, उनको छोड़ना श्रीराम के लिए सहज नहीं होगा, पर श्रीराम की जीवन यात्रा में स्वयं का सुख निहित नहीं था। वे तो जनकल्याण के लिए अवतरित हुए थे। मर्यादा पुरषोत्तम स्वरूप को साकार रूप देने आए थे, इसलिए अपनी संतान के विरह के मार्ग को भी सहर्ष स्वीकार किया। श्रीराम की पूरी जीवन यात्रा प्रत्येक स्वरूप में नए आयामों को स्थापित करने के लिए थी। उन्होने राज्य का भोग नहीं अपितु वनवास में रहकर अपने भक्तों की प्रार्थना और मनोरथ को सुना। भक्ति के अधीन होकर वे स्वयं अपने भक्तों के उद्धार के लिए जनमानस के बीच गए। जिनके चरण कमल के समान है, जिनके नयन कमल के समान है उन श्रीराम ने वनवास की प्रतिकूलता भी सहर्ष स्वीकार की। श्रीराम की विलक्षण लीला में माया रूपी सोने के मृग का अनुसरण करना भी शामिल था। स्वयं ब्रह्म होकर माया के पीछे दौड़ना मानवीय लीला का ही अंग है, क्योंकि उन्हें तो आगामी वर्षो के लिए मानव कल्याण के लिए उदाहरण प्रस्तुत करना था। प्रत्येक परिस्थिति से समाज को शिक्षा देना था। श्रीराम का जीवन हमें यह शिक्षा देता है कि यदि जीवन में कुछ अप्रत्याशित भी घटता है तो उस पर अतिरिक्त प्रतिक्रिया न देकर नियति के निर्णय को सहज स्वीकार करना चाहिए। श्रीराम ने यह सिखाया की जीवन हमारे अनुसार नहीं बल्कि नियति के अनुसार चलता है। प्रजा की प्रसन्नता के लिए श्रीराम ने अपना सुख, नींद, चैन, सर्वस्व सहर्ष ही त्याग दी।

श्रीराम ने शबरी की कुटिया में स्वयं जाकर यह सिद्ध किया कि यदि भक्त की भक्ति, प्रतीक्षा और विश्वास अडिग है तो प्रभु कभी उसे अस्वीकार नहीं करते। श्रीराम ने देवी अहिल्या को भी पाप के श्राप से मुक्त कर उनका उद्धार किया। श्रीराम की साधना तो सदैव भक्त का हित ही करती है। श्रीराम हमें पाप और संताप से पूर्णतः मुक्त कर सकते है। राम नाम हमें कुमति से सुमति प्रदान करता है। श्रीराम की प्रत्येक लीला मानव जीवन को साहस, धैर्य और त्याग को आत्मसात करने की प्रेरणा देती है।

राम नाम तो सभी अमंगल का हरण करने वाला है, इसलिए जब श्रीराम हृदय में वियरजमान हो जाते है तो सर्वत्र मंगल ही मंगल होता है। श्रीराम के अवतरण में छल-कपट कहीं भी दृष्टिगत नहीं होता है। राम नाम मन की पवित्रता और निर्मलता का कारक है और रामायण इस बात का साक्षी है कि यदि मन में श्रीराम की साधना दृढ़ हो तो श्रीराम का जीवन में आना निश्चित है। निश्छल भक्ति होने पर ही श्रीराम के चरण पखारने को मिलते है और प्रभु स्वयं चलकर अपने भक्त को यह सौभाग्य देते है। यह केवट का प्रसंग हमें सिखाता है। राम के जीवन में निर्मलता और सरलता का प्रवाह सर्वत्र विद्यमान था। मन का भाव ही श्रीराम की कृपा प्रदान करवाता है। जब श्रीराम ने पृथ्वी पर लीला समाप्त कर वापस प्रस्थान करने हेतु हनुमान जी से कहा तो हनुमान जी ने पूछा क्या प्रभु मुझे वहाँ श्रीराम कथा श्रवण करने को मिलेगी और यह जानकर ही उन्होने धरती पर निवास करने का निश्चय किया, इसी कारण वे सदैव श्रीराम कथा में उपस्थित रहते है, क्योंकि उन्हें राम नाम प्राणों से भी अधिक प्रिय है।      

राम नाम तो हमें जीवन में शाश्वत यश और आनंद प्रदायक है। श्रीराम के स्वरूप में सभ्यता, विचारधारा, संस्कृति एवं समानता का उत्कृष्ट रूप समन्वित है। राम नाम कि उत्कृष्टता तो उनके स्वरूप से भी अधिक है (राम से बड़ा राम का नाम)। राम का नाम तो इतना औदार्य है कि वो पात्र और अपात्र के निर्णयों में नहीं उलझता। वो तो सदैव कल्याण का मार्ग चयनित करता है। मन को निर्मलता की ओर प्रवाहित करता है। राम रक्षा स्तोत्र में भी उल्लेखित है कि यदि हमारे कर्म रूपी बीज यदि राम नाम के साथ प्रस्फुटित होंगे तो वे हमें अनंत सुख स्मृद्धि एवं सौभाग्य प्रदान करेंगे। इस राम नवमी के पावन अवसर पर यहीं प्रार्थना है कि सूर्यवंशी श्रीराम हम सभी पर अपनी शीतल कृपादृष्टि बनाए रखें और हमें जीवन में धैर्य, साहस और सरलता प्रदान करें, जिससे हम मानवयोनि में कल्याण को प्राप्त करें।

डॉ. रीना रवि मालपानी (कवयित्री एवं लेखिका)

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