अल्पसंख्यक संस्थानों को आरटीई से बाहर रखने पर उठाये सवाल

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अल्पसंख्यक संस्थानों को आरटीई से बाहर रखने पर उठाये सवाल

-सुप्रीम कोर्ट ने एक्ट को लेकर कह दी बड़ी बात, पूछा क्यो रखा गया बाहर

नई दिल्ली/शिव कुमार यादव/- सुप्रीम कोर्ट ने अल्पसंख्यक संस्थानों में शिक्षा के अधिकार पर 2014 के अपने ही फैसले पर संदेह जताया है, जिसमें आरटीई अधिनियम को इन संस्थानों पर लागू नहीं किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अल्पसंख्यक संस्थानों में शिक्षा के अधिकार को लेकर सवाल पूछा है। अदालत का मानना है कि यह फैसला सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा के मूल को कमजोर करता है और समावेशिता के विचार को खंडित करता है। इसके परिणाम दूरगामी हैं। इसलिए इसकी फिर से जांच करने की आवश्यकता है।

अल्पसंख्यक-संचालित स्कूलों में नियुक्ति के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य है या नहीं, इस पर तमिलनाडु और महाराष्ट्र की याचिकाओं पर निर्णय करते हुए, दो जजों की पीठ ने मामले को एक बड़ी पीठ को भेजने की वांछनीयता पर विचार करने के लिए सीजेआई को भेज दिया। बेंच ने कहा कि अल्पसंख्यक संस्थानों को अधिनियम के दायरे से बाहर रखने से समावेशिता का विचार कमजोर होगा।

संविधान पीठ के फैसले में विरोधाभास
सुप्रीम कोर्ट बेंच ने कहा कि अल्पसंख्यक स्कूल उस कानून से बाध्य नहीं हैं जो शिक्षकों की नियुक्ति और गरीब छात्रों के लिए मुफ्त शिक्षा के प्रावधान के नियम निर्धारित करता है। बेंच ने कहा कि उसके 2014 के फैसले ने अनुच्छेद 21ए के तहत आरटीई और अनुच्छेद 30(1) के तहत सामूहिक अधिकारों के बीच अनिवार्य रूप से विरोधाभास पैदा कर दिया है, जो अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने के अधिकार के बारे में है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता, जिन्होंने जस्टिस मनमोहन की सदस्यता वाली पीठ के लिए फैसला लिखा, ने कहा कि हम इस बात पर संदेह व्यक्त करते हैं कि क्या प्रमति एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट (मामला) (जहां तक यह अनुच्छेद 30 के खंड (1) के अंतर्गत आने वाले अल्पसंख्यक स्कूलों, चाहे वे सहायता प्राप्त हों या गैर-सहायता प्राप्त) पर आरटीई अधिनियम के लागू होने से छूट देता है… इसलिए, अंततः (फैसले पर) पुनर्विचार अपरिहार्य लगता है।

प्राथमिक शिक्षा की नींव खतरे में…
बेंच ने कहा, “हम अत्यंत विनम्रतापूर्वक यह टिप्पणी करते हैं कि प्रमति एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट (मामले) में लिए गए फैसले ने अनजाने में ही सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा की नींव को खतरे में डाल दिया होगा। अल्पसंख्यक संस्थानों को शिक्षा का अधिकार अधिनियम से छूट देने से समान स्कूली शिक्षा की अवधारणा खंडित होती है और अनुच्छेद 21ए में निहित समावेशिता और सार्वभौमिकता का विचार कमजोर होता है।

बेंच ने कहा, हमें डर है कि यह जाति, वर्ग, पंथ और समुदाय के बच्चों को एकजुट करने के बजाय, साझा शिक्षण स्थलों की परिवर्तनकारी क्षमता को ’विभाजित’ और ’कमजोर’ कर देगा। अगर लक्ष्य एक समान और एकजुट समाज का निर्माण करना है, तो ऐसी छूट हमें विपरीत दिशा में ले जाएगी। बेंच ने चार मुद्दों को एक बड़ी पीठ की तरफ से निर्णय के लिए निर्धारित किया, जिसमें यह भी शामिल था कि क्या अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को शिक्षा का अधिकार अधिनियम के दायरे से छूट देने वाले 2014 के फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। पीठ ने कहा कि अल्पसंख्यक स्कूलों को अधिनियम से छूट का दुरुपयोग किया जा रहा है।

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