अब लाचारी नहीं रही रीढ़ की सर्जरी

स्वामी,मुद्रक एवं प्रमुख संपादक

शिव कुमार यादव

वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी

संपादक

भावना शर्मा

पत्रकार एवं समाजसेवी

प्रबन्धक

Birendra Kumar

बिरेन्द्र कुमार

सामाजिक कार्यकर्ता एवं आईटी प्रबंधक

Categories

September 2026
MTWTFSS
 123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
282930 
September 23, 2026

हर ख़बर पर हमारी पकड़

अब लाचारी नहीं रही रीढ़ की सर्जरी

-लक्षण पहचान समय रहते करे बिमारी के निदान के उपाय, सर्जरी के प्रति ना पाले भ्रांति

नजफगढ़ मेट्रो न्यूज/नई दिल्ली/शिव कुमार यादव/- रीढ़ की हड्डी का संकरा होना बढ़ते उम्र (50 वर्ष से ज्यादा) व बुढ़ापे की आम बीमारी है। यह साधारणतः रीढ़ की हड्डी में बढ़ती उम्र के साथ टूट-फूट या घिसाव के कारण होती है। गठिया भी बढ़ती उम्र के साथ इस बीमारी का मूल कारण है। इस बीमारी में नसें संकरे रास्ते में फंस कर जाम हो जाती हैं। इस बीमारी के शुरूआत में कुछ दूर चलने पर या काफी देर खड़े होने पर लक्षण नजर आते है. जैसे :- दोनों पैरों में सुन्नापन आना या चीटियों सी चलना व सूइयों सा चूभना या जलन जैसा महसूस होना। इसके अलावा कमर में दर्द या पैरों में सियाटिका का होना। पैरों व बटक में भारीपन या थकावट या बैचेनी। पैरों में कमजोरी आना या मल-मूत्र पर नियंत्रण खोना।
                 नई दिल्ली स्थित पीएसआरआई हॉस्पिटल के सीनियर कंसलटेंट न्यूरोसर्जरी डॉ. अमिताभ गुप्ता का कहना है कि शुरू में तो इन लक्षणों में कुछ देर बैठने पर आराम आता है व मरीज फिर से कुछ दूर तक चल पाता है। अंततः समय के साथ मरीज न चल पाता है, न खड़ा हो पाता है व चरपाई पकड़ लेता है। इस स्थिति को आने में कुछ साल लग जाते हैं। जिस दौरान वो डॉक्टर को दिखाता है व दवाईयों से ही इलाज की कोशिश करता है। इस बीमारी के इलाज में दवाईयां नाकाम सिद्ध होती है व सर्जरी से ही आराम आता है। सर्जरी ना कराने का मूल कारण है कि समाज में यह वहम है कि रीढ़ की हड्डी का ऑपरेशन के बाद दोनों टागें बेकार हो जाती है और फिर पूरा जीवन चरपाई पर ही व्यतीत करना पड़ता है। अफसोस यह सोच पढ़े-लिखे लोगों की भी है। लेकिन आज विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि हम दूसरे ग्रहों की ओर ले जाने की तैयारी कर रहे है और साथ ही मनुष्य के कृत्रिम अंग विकसित करने और उन्हें ट्रांसप्लांट करने के तरीके ढूढ़ रहे है। वही दूसरी ओर रीढ़ की हड्डी की बीमारी को समाज की सोच ने मरीज को इतना मजबूर कर दिया है कि वे इसके कारण अपनी जिंदगी को अपंग जैसा या लाइलाज बना लेते है। इस बीमारी को आसानी से सर्जरी के द्वारा ठीक किया जा सकता है। डॉ. अमिताभ गुप्ता का कहना है कि रीढ़ की बड़ी हुई हड्डी को काट कर नसों को खोला जाता है व जिन लोगों में बढ़ती आयु के कारण स्पाइन अस्थिर हो जाती है, उनमें मजबूती के लिए पेंच व रोड़ स्पाइन सर्जरी के दौरान ही डाल दिये जाते हैं। ये स्पाइन सर्जरी उतनी ही सुरक्षित है जितनी की हार्निया या गलैंड ब्लेडर की कोई सर्जरी। इस बीमारी से बचने के लिए नियमित व्यायाम व वजन नियंत्रित रखना जरूरी है। रीढ़ की हड्डी को कसरत द्वारा लचीला रख कर भी इस मर्ज से बचा सकता है। 

About Post Author

Subscribe to get news in your inbox