अब ठेके के सिपाही करेंगे सरहदों की चौकीदारी

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October 27, 2026

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अब ठेके के सिपाही करेंगे सरहदों की चौकीदारी

-कॉनफैडरेसन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस मार्टियरस वेलफेयर एसोसिएशन ने सरकार की इस योजना पर जताया ऐतराज
-कहा- सैनिकों की नही राजनेताओं की पेंशन व सुविधाओं में कटौती करे सरकार
नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/नई दिल्ली/शिव कुमार यादव/- देश में ठेकेदारी प्रथा जोर पकड़ती जा रही है। हर क्षेत्र में सरकार निजीकरण को बढ़ावा दे रही है। यहां तक की अब तो देश में सरहदों की रक्षा के लिए भी ठेके के सिपाहियों को तैनात करने पर विचार किया जा रहा है। यानी की अब देश की सरहदों की रक्षा ठेके के कर्मचारी करेंगे। कॉनफैडरेसन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस मार्टियरस वेलफेयर एसोसिएशन ने सरकार की इस नीति पर ऐतराज जताते हुए कहा कि सरकार को सैनिकों के मामले में ये कदम उठाने की बजाये राजनेताओं की पेंशन व सुविधाओं में कटौती करनी चाहिए। जिससे देश पर पड़ने वाला बोझ कम हो सके।
                सुनने में संविदा शब्द अजीब सा लगे लेकिन अगर ये सही है तो अब भारतीय सेनाओं में संविदा सिपाहियों को कॉनटैक्ट बेस पर तीन सालों के लिए रखा जाएगा व बाद में इनकी सेवा में इजाफा किया जा सकता है। इसका सबसे बड़ा फायदा सरकार को होने जा रहा है। क्योंकि उपरोक्त ठेके पर भर्ती किए गए सैनिकों को रिटायरमेंट व पैंशन जैसी सुविधाएं नहीं देनी पड़ेगी। इस योजना के तहत भर्ती किये गये विशेष रंगरुटों को अग्निवीर का नाम दिया जाएगा।
                कॉनफैडरेसन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस मार्टियरस वेलफेयर एसोसिएशन महासचिव रणबीर सिंह ने एतराज जताते हुए कहा कि यह योजना देश के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकती है। सरकार का थोड़ा सा लालच देश की सुरक्षा के लिए नुकसान दायक भी बन सकता है। उन्होने कहा कि नवनियुक्त अग्निवीरों जिनको तीन साल के लिए ठेके पर भर्ती किया गया हो उनके भरोसे सरहदों की चाक-चौबंद चौकसी सोचकर ही डर लगता है। उन्होने कहा कि सरकार जवानों की पैंशन देने से घबरा गई है। कहीं ये पुरानी पैंशन व्यवस्था को खत्म करने की दिशा में पहला कदम तो नहीं। क्या सरहदों पर खड़े अग्निवीर को अपने भविष्य की चिंता नहीं सताएगी। जब बाजार भाव पर टिकी नई पैंशन के तहत वापस घर जाएगा। कॉनफैडरेसन महासचिव ने लोकप्रिय प्रधानमंत्री जी से अपील करते हुए कहा कि यह संविदा प्रथा राजनीति में प्रवेश करने वाले उम्मीदवारों पर भी लागू होनी चाहिए। चुनाव में वही उम्मीदवार लड़े जिसने कम से कम 5 सालों तक भारतीय सेना में कदमताल कर सरहदों की चौकीदारीं की हो ताकि उसे राष्ट्रीयता के सही मायनों का पता चल सके इससे ना केवल सेना में भर्ती होने पर एक नई ऊर्जा की अनुभूति का एहसास होगा बल्कि राजनीति में एक नई स्वच्छ परम्परा का आगाज होगा। साथ ही सांसदों को दी जाने वाली पैंशन से करोड़ों रुपए की सालाना बचत होगी।

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