मनोहर-मान करेंगे एसवाईएल नहर विवाद पर बात, क्या सुलझेगा 56 साल पुराना विवाद?

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मनोहर-मान करेंगे एसवाईएल नहर विवाद पर बात, क्या सुलझेगा 56 साल पुराना विवाद?

-56 साल पुराना विवाद है क्या और क्यों हो रही यह बैठक?

चंडीगढ़/- हरियाणा और पंजाब के मुख्यमंत्री शुक्रवार को सतलुज यमुना लिंक (एसवाईएल) नहर विवाद पर चर्चा करेंगे। दोनों राज्यों के बीच दशकों से पानी के बंटवारे को लेकर विवाद चल रहा है। इस मुलाकात के तय होने के साथ ही ये विवाद फिर से चर्चा में आ गया है। दोनो नेताओं की बातचीत को लेकर चर्चाऐं भी तेज हो गई है। लोग अब इस बात पर चर्चा कर रहे है कि क्या वास्तव में 56 साल पुराना विवाद सुलझा जायेगा और हरियाणा को उसके हिस्से का पानी मिलने लगेगा।

आखिर दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक क्यों हो रही है? एसवाईएल को लेकर विवाद क्या है? पंजाब इसे लेकर क्या दावा करता है? हरियाणा का क्या कहना है? एसवाईएल प्रोजेक्ट क्या है? दोनों राज्यों के बीच विवाद की वजह से क्या-क्या हो चुका है? इन सभी सवालों के जवाब अब देश की जनता जानना चाहती है।

ये बैठक क्यों हो रही है?  
ये बैठक सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश की वजह से हो रही है। कोर्ट ने पिछले महीने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से मुलाकात करने को कहा था। कोर्ट ने कहा था इस बैठक मे दोनों नेता एसवाईएल मुद्दे के सौहार्दपूर्ण समाधान का रास्ता खोजें।

दरअसल, हरियाणा ने कोर्ट को बताया था कि पंजाब के मुख्यमंत्री हरियाणा के साथ बैठक को लेकर अनिच्छुक हैं। कोर्ट के कहने के बाद दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की यह बैठक हो रही है।

बैठक के बाद क्या होगा?
दोनों राज्यों को 15 अक्टूबर को कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करना है। इस बैठक के बाद दोनों राज्य अपने जवाब तैयार करेंगे। जो उन्हें कोर्ट में दाखिल करना होगा। दोनों राज्यों द्वारा दिए जाने वाले जवाब से ही तय होगा कि यह मामला किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

एसवाईएल को लेकर विवाद क्या है?
एक नवंबर 1966 को पंजाब से अलग होकर हरियाणा राज्य की स्थापना हुई। उसी दिन से इस विवाद की शुरुआत होती है। नए राज्य के गठन के साथ पंजाब को नदियों का पानी साझा करने की जरूरत हुई। लेकिन, पंजाब ने रावी और ब्यास नदियों का पानी हरियाणा से बांटने के विरोध किया।
             हरियाणा के गठन से एक दशक पहले रावी और ब्यास में बहने वाले पानी का आकलन 15.85 मिलियन एकड़ फीट किया गया। केंद्र सरकार ने 1955 में राजस्थान, अविभाजित पंजाब और जम्मू कश्मीर के बीच एक बैठक आयोजित कराई। ये नदियां इन्हीं तीनों राज्यों से गुजरती थीं। तब राजस्थान को आठ एमएएफ, अविभाजित पंजाब को  7.20 एमएएफ और जम्मू कश्मीर को 0.65 एमएएफ पानी आवंटित किया गया।
             हरियाणा के गठन के बाद पंजाब के हिस्से के 7.2 एमएएफ पानी में से 3.5 एमएएफ हरियाणा को आवंटित किए गए। 1981 में हुए पुनर्मूल्यांकन के बाद पानी का आंकलन बढ़ाकर 17.17 एमएएफ कर दिया गया। इसमें से पंजाब को 4.22 एमएएफ, हरियाणा को 3.5 एमएएफ और राजस्थान को 8.6 एमएएफ पानी आवंटित हुआ। हालांकि, ये बंटवारा कभी लागू नहीं हो सका।

सतलुज-यमुना लिंक प्रोजेक्ट क्या है?
आठ अप्रैल 1982 को उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सतलुज-यमुना लिंक नहर के निर्माण की आधारशिला रखी। इंदिरा ने पंजाब के पटियाला जिले के कपूरी गांव में योजना की नींव रखी। 214 किलोमीटर लंबी यह नहर पंजाब में बहने वाली सतलुज और हरियाणा से गुजरने वाली यमुना नदी को जोड़ने के लिए बननी थी।


             नहर के कुल 214 किलोमीटर में से 122 किलोमीटर हिस्सा पंजाब और 92 किलोमीटर हिस्सा हरियाणा में पड़ता है। योजना की शुरुआत होते ही अकाली दल ने इसका विरोध शुरू कर दिया। इसके खिलाफ अकाली दल ने आंदोलन की शुरुआत की और कपूरी मोर्चा निकाला। बढ़ते विरोध के बीच जुलाई 1985 में उस वक्त के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तब के अकाली दल के प्रमुख संत हरचंद सिंह लोंगोवाल के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। जिसमें पानी का आंकलन नए सिरे से करने के लिए ट्रिब्यूनल बनाने पर सहमति बनी।    
             राजीव गांधी और लोंगोवाल के बीच हुए समझौते के मुताबिक एराडी ट्रिब्यूनल का गठन हुआ। इस ट्रिब्यूनल के प्रमुख सुप्रीम कोर्ट जज वी. बालाकृष्णन एराडी थे। इस ट्रिब्यूनल ने नए सिरे से पानी के बंटवारे का आंकलन किया। 1987 में ट्रिब्यूनल ने अपनी रिपोर्ट सौंपी। कमेटी ने पंजाब के पानी के कोटे को बढ़ाकर 5 एमएएफ कर दिया गया। हरियाणा का कोटा बढ़ाकर 3.83 एमएएफ करने की सिफारिश की।

पंजाब का दावा क्या है?
पंजाब ने रिपेरियन सिद्धांत का हवाला दिया और उसके अनुसार नदियों के जल पर अपना ज्यादा अधिकार बताया। यह सिद्धांत कहता है कि जिस राज्य होकर कोई नदी गुजरती है उसके पानी पर उसका अधिकार है। राज्य के लगभग 79 फीसदी क्षेत्र में पानी का अत्यधिक दोहन है और ऐसे में सरकार का कहना है कि किसी अन्य राज्य के साथ पानी साझा करना उसके लिए असंभव है।

हरियाणा का इस पूरे मामले में क्या रुख है?
हरियाणा एसवाईएल नहर के जरिए रावी-ब्यास के पानी पर अपना दावा करता रहा है। उसका कहना है कि इसके बिना उसके लिए राज्य की सिंचाई जरूरतों को पूरा करना मुश्किल है। राज्य के दक्षिणी हिस्से में भूमिगत जल का स्तर 1700 फीट तक पहुंच गया है। इससे इस इलाके में पीने के पानी का संकट है। हरियाणा केंद्रीय खाद्य पूल में अपने योगदान का हवाला देता रहा है। उसका तर्क है कि ट्रिब्यूनल द्वारा किए गए मूल्यांकन के अनुसार उसे पानी में उसके उचित हिस्से से वंचित किया जा रहा है।

दोनों राज्यों के बीच विवाद की वजह से क्या-क्या हो चुका है?
जुलाई 1985 में राजीव-लोंगोवाल समझौते के महज एक महीने बाद ही 20 अगस्त 1985 को लोंगोवाल की उग्रवादियों ने हत्या कर दी। 1990 में एसवाईएल प्रोजेक्ट पर काम कर रहे चीफ इंजीनियर एमएल सेखरी एवं इंजीनियर अवतार सिंह औलख की हत्या हो गई। दो अलग-अलग मौकों पर मजदूरों की गोली मार दी गई। इसके बाद नहर का निर्माण रोक दिया गया।  

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