फोर्टिस अस्पताल में हाई रिस्क ब्लड कैंसर के मरीज को मिली नई जिंदगी

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फोर्टिस अस्पताल में हाई रिस्क ब्लड कैंसर के मरीज को मिली नई जिंदगी

-बोन मैरो ट्रांस्प्लांट से मिली सफलता

नोएडा/- हेमेटोलॉजी और स्टेम सेल ट्रांस्प्लांट के क्षेत्र में मेडिकल प्रगति के साथ, बोन मैरो ट्रांस्प्लांट लाइलाज और घातक कैंसर के लिए सबसे अच्छे ट्रीटमेंट के विकल्प के रूप में उभर रहा है। बोन मैरो हड्डियों के अंदर नरम वसायुक्त टिशू है जो रक्त कोशिकाओं में फैलते हैं। इस प्रक्रिया को दो हिस्सों में बांटा गया है- एलोजेनिक (टिशू मैच वाला कोई भी डोनर) और ऑटोलॉगस (जहां मरीज के शरीर से स्टेम सेल लिए जाते हैं)। बीएमटी प्रक्रिया के दौरान, क्षतिग्रस्त या नष्ट हो चुके बोन मैरो को स्वस्थ बोन मैरो से बदलने की जरूरत होती है। इसमें सबसे अहम काम मरीज और डोनर की सेल्स का मिलान करना है।
                 फोर्टिस अस्पताल के डॉक्टरों ने हाई रिस्क ब्लड कैंसर से पीड़ित 45 वर्षीय मरीज का सफलतापूर्वक इलाज किया। क्योंकि ब्लड कैंसर हाई रिस्क की स्थिति में पहुंच चुका था, इसलिए मरीज को बचाने के लिए तत्काल इलाज की जरूरत थी। हाई रिस्क वाला केस होने के चलते महज कीमोथेरेपी का इस्तेमाल करना नाकाफी था और केस के बिगडऩे की आशंका अधिक थी।  नोएडा स्थित फोर्टिस अस्पताल में हेमेटोलॉजी के डायरेक्टर और एचओडी डॉ राहुल भार्गव के नेतृत्व में डॉक्टरों की एक टीम ने इस मरीज का सफल इलाज किया। कैंसर का मरीज थकान, सांस लेने में तकलीफ, बुखार और शरीर में दर्द के लक्षणों के साथ अस्पताल में आया था। विस्तृत जांच रिपोर्ट से पता चला कि मरीज हाई रिस्क कैंसर से पीड़ित है और उसे तत्काल इलाज की जरूरत है। कैंसर की प्रकृति आक्रामक होने के चलते कैंसर सेल्स को कंट्रोल करने के लिए पहले इंडक्शन कीमोथेरेपी और सपोर्टिव केयर की मदद से कैंसर का भार कम किया गया और बोन मैरो ट्रांस्प्लांट के लिए मरीज की विस्तृत जांच की गई। मरीज की जेनेटिक और म्यूटेशन टेस्टिंग की गई।

डॉ राहुल भार्गव ने कहा, मरीज को फुल मैच बोन मैरो ट्रांस्प्लांट की सख़्त जरूरत थी। सौभाग्य से मरीज के बड़े भाई का बोन मैरो पूरी तरह मैच हो गया और वो अपनी बहन की जिंदगी बचाने के लिए स्टैक सैल्स डोनेट करने को तैयार हो गया। हेमेटोलॉजी के कंसल्टेंट डॉ.अनुपम शर्मा ने कहा कि ऐसे हाई रिस्क केस में बोन मैरो ट्रांस्प्लांट मरीज के इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बोन मौरो ट्रांस्प्लांट के दौरान, लाल रक्त कोशिकाओं, सफेद रक्त कोशिकाओं और प्लेटलेट्स को पूरी तरह नष्ट कर दिया जाता है। इस समय कम प्रतिरोधक क्षमता के चलते मरीज एक नवजात शिशु की तरह होता है, जो संक्रमण के लिए अतिसंवेदनशील होता है। कई तरह की परेशानियों और संक्रमणों के प्रबंधन के संबंध में बीएमटी के दौरान मरीज को स्थिर करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। एक अलग व्यक्ति से स्टेम सेल को मरीज के शरीर में ट्रांसफर करना और फिर एक सफल प्रत्यारोपण के लिए उसकी स्वीकृति महत्वपूर्ण है।
                 ये मरीज बहुत भाग्यशाली थीं क्योंकि मरीज और उसके भाई बीएमटी के लिए 100 प्रतिशत मैच थे, हालांकि, भाई-बहनों में 100 प्रतिशत एमबीटी मैच की संभावना केवल 25-30 प्रतिशत होती है। वहीं, वर्तमान परिदृश्य में, भारत में जिन परिवारों में एक या दो बच्चे हैं। वहां पूरी तरह से मेल खाने वाले भाई-बहनों को खोजने के चांस और कम हो जाते हैं हालांकि, आजकल मेडिकल फील्ड में तरक्की के साथ ही आधे मिलान वाले भाई-बहन वाले केसों में भी अच्छे परिणाम देखने को मिल रहे हैं।

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