भोजली पर्व: छत्तीसगढ़ की महिलाओं का धन, धान्य और कल्याण का मंगल उत्सव

स्वामी,मुद्रक एवं प्रमुख संपादक

शिव कुमार यादव

वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी

संपादक

भावना शर्मा

पत्रकार एवं समाजसेवी

प्रबन्धक

Birendra Kumar

बिरेन्द्र कुमार

सामाजिक कार्यकर्ता एवं आईटी प्रबंधक

Categories

April 2026
M T W T F S S
 12345
6789101112
13141516171819
20212223242526
27282930  
April 16, 2026

हर ख़बर पर हमारी पकड़

भोजली पर्व: छत्तीसगढ़ की महिलाओं का धन, धान्य और कल्याण का मंगल उत्सव

रक्षाबंधन के ठीक दूसरे दिन पड़ने वाले इस पर्व को छत्तीसगढ़ की महिलायें विशेष उत्साह के साथ मनाती हैं। छत्तीसगढ़ में भोजली का अर्थ देवी से लिया जाता है। ये भोजली गाँव व किसान के घरों में पूरी उमंग और उल्लास के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व के पूर्व  पड़ने वाले नागपंचमी पर्व के दूसरे दिवस से ही महिलाएं व लड़कियां अपने अपने घरों में गेहूं या ज्वार को अपनी मन्नत के अनुसार टोकनी थाली, गंज, परई या जमीन में अंकुरण के लिए बो  देती हैं। भोजली पर्व के आते आते ये अंकुरित पौधे बढ़ चुके होते हैं। फिर भोजली पर्व के दिन इन पौधों (भोजली) की पूजा की जाती है। घर के लोग प्रातः से ही स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहनकर पूजा अनुष्ठान को संपन्न करते हैं। इसके लिए सबसे पहले भोजली में जल चढ़ाया जाता है। फिर बंदन, रोली, सिंदूर, हल्दी से भोजली का अभिषेक किया जाता है। इसके पश्चात फूल, हल्दी लगा चावल (अक्षत), कोई
मौसमी फल और नारियल खासतौर पर चढ़ाया जाता है। अपनी सामर्थ्यानुसार उमंग और उल्लास व्यक्त करने के लिए अधिकांश घरों में पकवान भी बनाये जाते हैं। दोपहर के बाद घर में सभी पूजा अनुष्ठानों को सम्पन्न करने के उपरांत सभी महिलायें लड़कियां अपने- अपने घरों से भोजला देवी के सिर पर रखकर गाँव के प्रमुख स्थान पर एकत्र होकर कतारबद्ध हो भोजली गीत गाते नदी तालाब तक जाती हैं।

इस समय महिलाएं खूब उल्लास और गाजा बाजा के साथ जलाशय तट पर पहुँचती हैं। नदी या तालाब में पहुँचने के बाद सभी भोजली के पात्रों को किनारे स्वच्छ स्थान पर रख देती हैं और पुनः वहाँ भी दीप जलाकर उनकी आरती एवं पूजा करती हैं एवं नारियल फोड़ती हैं। इसके बाद भोजली के कुछ पौधों को रखकर सभी पौधों को जल में विसर्जित कर दिया जाता है। नदी तट से वापस भोजली लेकर लौटती महिलाओं का दल कतार में वापस लौटता है। इस हुजूम को "भोजली गंगा " कहते हैं। भोजली के पौधों को आपस में आदान प्रदान कर लोग एक दूसरे की कुशलता एवं सम्पन्नता के लिए शुभकामनाएं देते चलते हैं। इसी भोजली देवी को कुछ लोग आपस में अदल बदल कर गियां(मितान)बदले हैं। इसके अनुसार इनकी दोस्ती या संबंध इतना अटूट माना जाता। "कि खून के रिश्ते भले ही टूट जायें पर भोजली में बदले गये मितान के साथ के रिश्ते कभी भी नहीं तोड़े जाते । इस पर लोगों की आस्था अनंत है। यह रिश्ता भी इसका विशेष महत्व बढ़ता है। भोजली के पौधों को लोग अपने घर के सभी स्वच्छ स्थानों में सभी कोनों में रख देते हैं और यह प्रार्थना करते. हैं कि हमेशा घर में खुशियाँ कायम रहे एवं घर हरा भरा रहे। वास्तव में देखा जाय तो भोजली सुख समृद्धि की कामना और खेती की उपज (पैदावार) खूब अच्छी हो इस इच्छा को पूरा करने के लिये मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ का यह प्रमुख त्यौहार है । 

बिलासपुर शहर में भी किला वार्ड के पचरी घाट में आज के दिन भोजली गंगा में महिलाओं का विशालहुजूम और उनके उल्लास देखते ही बनता है। इस समय यहाँ पैर रखने को जगह नहीं मिलता। किलावार्ड चौक में अच्छा खासा मेला भी भरता है जहाँ खेल खिलौने और भूले आते हैं। तरह तरह के खाने-पीने के स्टाल लगे होते हैं। इस मेले में महिलायें बच्चे विशेषकर पहुँचते हैं। और इस भोजली पर्व के  उत्साह और उमंग को दुगना करते हैं।

About Post Author

आपने शायद इसे नहीं पढ़ा

Subscribe to get news in your inbox