दिल्ली की ऐतिहासिक इमारत ने पूरे किए 100 साल

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August 24, 2026

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दिल्ली की ऐतिहासिक इमारत ने पूरे किए 100 साल

-ब्रिटेन और अमेरिका से आते थे दिग्गज

नई दिल्ली/सिमरन मोरया/-  दिल्ली के लोगों ने आंबेडकर स्टेडियम के ठीक सामने दिल्ली पारसी अंजुमन की बिल्डिंग जरूर देखी होगी। कुछ दिन पहले यहां बहुत हलचल थी। लग्जरी कारों में पारसी और गैर-पारसी आ रहे थे। मौका था दिल्ली पारसी अंजुमन बिल्डिंग के सौ साल पूरे होने का। कुछ पारसी ब्रिटेन, अमेरिका और हैदराबाद तक से आए थे। लंदन से कोबरा बीयर के मालिक लॉर्ड करण बिलमोरिया भी आए थे। उस दिन रुखसाना श्रॉफ की किताब The Parsis Of Delhi का विमोचन भी हुआ था।

दिल्ली पारसी समाज के बेहद सक्रिय सदस्य थे खालसा कॉलेज में अंग्रेजी के प्रो. नोवी कपाडिया। वह बताते थे कि दिल्ली में शुरू में पारसी कश्मीरी गेट में आकर बसे। ये 1860 के बाद की बातें हैं। वहां पर ही एक पारसी सज्जन अपोलो होटल नाम से एक पारसी होटल भी चलाते थे। उन्हीं पारसियों ने 1925 में बहादुर शाह जफर मार्ग पर पारसी अंजुमन की स्थापना की। यह दिल्ली-एनसीआर के छोटे पर जीवंत पारसी समुदाय की धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और कल्याणकारी गतिविधियों का केंद्र है।

अंजुमन में क्या-क्या?
दिल्ली पारसी अंजुमन परिसर में उत्तर भारत का एकमात्र पारसी अग्नि मंदिर है, जिसका उद्घाटन 1959 में हुआ था। यहां पवित्र अग्नि निरंतर प्रज्ज्वलित रहती है, जो पारसी धर्म का केंद्र बिंदु है। पारसी यहां प्रार्थना करने और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने आते हैं। इसका निर्माण टाटा समूह के सहयोग से संभव हुआ था। पारसी अंजुमन में एक धर्मशाला भी है। यह दिल्ली आने वाले पारसी यात्रियों और समुदाय के सदस्यों को किफायती आवास प्रदान करती है। यहां शादियों, नवरोज जैसे त्योहारों, गाथाओं, सामुदायिक बैठकों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और अन्य सामाजिक समारोहों का आयोजन किया जाता है।

दिल्ली-मुंबई के पारसी
दिल्ली और मुंबई के पारसी समाज कुछ अलग हैं। इनमें समानता कम है। जहां मुंबई में आपको टाटा, गोदरेज, वाडिया समेत और भी कई मशहूर पारसी मिलते हैं। दिल्ली में पारसी बिरादरी के सदस्य मुख्य रूप से वकालत, मेडिसन और शिक्षा जैसे क्षेत्रों से जुड़े हैं। दिल्ली में इनकी तादाद सिर्फ 500 के आसपास है।

कहां गए कश्मीरी गेट से
दिल्ली में एक दौर कश्मीरी गेट और मोरी गेट में दर्जनों पारसी परिवार रहते थे। कश्मीरी गेट-मोरी गेट से निकलकर कुछ पारसी परिवार डिफेंस कालोनी में भी रहने लगे। अब भी डिफेंस कालोनी में 5-7 पारसी परिवार रहते हैं। कुछ पारसी परिवार गुड़गांव में भी शिफ्ट कर गए। दिल्ली के पारसी हिंदी, गुजराती और अंग्रेजी ही बोलते हैं।

कब से दिल्ली में
दिल्ली में कब से हैं पारसी? इस सवाल का जवाब मिलता है इंडिया गेट के करीब पृथ्वीराज रोड पर स्थित पारसी कब्रिस्तान में जाकर। वहां पर एक शिलापट्ट पर लिखा है कि सबसे पहले पारसी दिल्ली में 1869 में आए। दिल्ली के प्रमुख पारसियों में दादी मिस्त्री रहे हैं। वे लंबे समय तक माइनॉरिटी कमिशन के मेंबर रहे। उनका परिवार करीब 75 साल से दिल्ली में बसा हुआ है।

अशोक होटल से ओबेरॉय होटल
राजधानी के पहले पांच सितारा अशोक होटल का डिजाइन भी पारसी प्रो. ईबी डॉक्टर ने ही तैयार किया था। पर वे मुंबई वाले थे। ओबेरॉय इंटरकॉन्टिनेंटल का डिजाइन पीलू मोदी ने बनाया था। राज्यसभा सदस्य रहे पीलू मोदी भी पारसी समाज से थे।

नरीमन-सोराबजी
दिल्ली में लंबे समय तक कम से कम दो पारसियों फली नरीमन और सोली सोराबजी का लीगल क्षेत्र में दबदबा बना रहा। ये दोनों मूल से तो मुंबईकर थे, पर दिल्ली में बस गए थे। फली नरीमन जब कोर्ट में जिरह करते थे, तब अपने तर्कों को वजनदार बनाने के लिए पुराने फैसलों और परंपराओं की झड़ी लगा देते थे। उनकी स्मरण शक्ति गजब की थी। अगर बात सोली सोराबजी की हो तो उन्हें जेंटलमैन वकील भी कहा जाता था। उनके तर्क अकाट्य होते थे।

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