गरीबी कोटे के तहत मिलने वाले पैसे का गबन कर रहे प्राइवेट स्कूल

स्वामी,मुद्रक एवं प्रमुख संपादक

शिव कुमार यादव

वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी

संपादक

भावना शर्मा

पत्रकार एवं समाजसेवी

प्रबन्धक

Birendra Kumar

बिरेन्द्र कुमार

सामाजिक कार्यकर्ता एवं आईटी प्रबंधक

Categories

September 2026
MTWTFSS
 123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
282930 
September 23, 2026

हर ख़बर पर हमारी पकड़

गरीबी कोटे के तहत मिलने वाले पैसे का गबन कर रहे प्राइवेट स्कूल

-गरीब बच्चों को नही दी जा रही किताबें व वर्दी, अभिभावक परेशान

नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/नई दिल्ली/शिव कुमार यादव/- दिल्ली सरकार वैसे तो शिक्षा व स्कूलों को लेकर बड़े-बड़े दावे कर रही है। पंजाब में तो आप सरकार ने प्राइवेट स्कूलों पर शिकंजा कसना भी शुरू कर दिया है लेकिन दिल्ली में सरकार के दावे उस समय हवा हवाई होते दिखे जब प्राइवेट स्कूलों की फीस व दाखिले को लेकर चल रही मनमानी की शिकायतों पर सरकार अपना रूख नही स्पष्ट कर पाई। अब प्राइवेट स्कूलों पर सरकार द्वारा गरीबी कोटे के बच्चों के लिए किताबों व वर्दी के पैसे में गबन करने का मामला सामने आया है और दिल्ली सरकार इस पर भी चुप्पी साधे हुए है। इस सारे मामले से जहां गरीब बच्चों की शिक्षा पर सवालिया निशान लग गया है वहीं बच्चों के अभिभावक अपनी शिकायतों को लेकर इधर-उधर ही भटक रहे हैं।
              यहां बता दें कि दिल्ली में अब पब्लिक स्कूल पूरी तरह से मनमानी पर उतर आये है। दिल्ली में ऐसे अनेकों स्कूल है जो सरकार द्वारा दिए जा रहे पैसे का गबन कर रहे हैं? सरकार आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए क़िताब, कापियों और वर्दी के पैसे स्कूलों को देती है। लेकिन स्कूल बच्चों को वर्दी और किताबें मुफ्त नहीं देते हैं। आर्थिक रुप से कमजोर माता-पिता हजारों रुपयों की किताबें, कापियां और वर्दी स्कूल से खरीदने के लिए मजबूर हैं। स्कूल वाले इस तरह बच्चों के नाम पर सरकार द्वारा दिए जा रहे पैसे को हड़प कर अपराध कर रहे हैं।
                   अभिभावकों ने दिल्ली सरकार के उप मुख्यमंत्री एवं शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया को ऐसी पुख्ता व्यवस्था करने की मांग की है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि बच्चों को वर्दी और किताबें मिल सही से मिल रहे हैं। उन्होने उन शिक्षा अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाया है जिनके क्षेत्र में इस तरह की धोखाधड़ी चल रही है। अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा विभाग के अफसरों कार्य यह सुनिश्चित करना होता है कि सरकारी योजना का लाभ उन गरीब बच्चों को मिले जिनके लिए योजना बनाई गई हैं। शिक्षा विभाग के एक वरिष्ठ अफसर ने बताया कि सरकार पब्लिक स्कूल वालों को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को वर्दी, किताबें, कापियां आदि देने के लिए रकम देती है। स्कूल वाले शिक्षा विभाग में उन बच्चों की सूची और बिल भी जमा कराते हैं जिनको वर्दी और किताबें दी गई है। जिसके आधार पर सरकार स्कूल को रकम का भुगतान करती हैं।
                  शिक्षा विभाग के जोन के संबंधित अफसरों का काम होता है कि वह खुद भी बच्चों के अभिभावकों से संपर्क करें और यह सुनिश्चित करें कि बच्चों को वर्दी और किताबें स्कूल ने दी हैं या नहीं। शिक्षा विभाग के एक वरिष्ठ अफसर ने बताया कि कई अफसर अपने कार्य को पूरी गंभीरता और ईमानदारी से करते हैं वह केवल स्कूल द्वारा दिखाए गए रिकार्ड से ही संतुष्ट नहीं होते हैं। स्कूल ने बच्चों को वास्तव में वर्दी और किताबें दी है या नहीं, यह पता लगाने के लिए ऐसे अफसर खुद ही अभिभावकों से संपर्क भी करते हैं। अगर सभी अफसर इसी तरीके से कार्य करें तो सरकार की योजना का लाभ जरुरतमंद बच्चों को मिल सकता है।
                   बच्चों को वर्दी और किताब कापियां नहीं दिए जाने से पता चलता है कि शिक्षा विभाग के अफसरों की लापरवाही या स्कूल वालों से उनकी  मिलीभगत के चलते बच्चों को वर्दी और किताबें नहीं मिलती।
                   आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के अभिभावक किताबों, कापियों और वर्दी के लिए स्कूल के चक्कर काट रहे हैं। बिना किताबों के वह कैसे बच्चों को पढ़ाएं। हैरानी की बात है कि स्कूल स्टाफ द्वारा प्रिंसिपल का फोन नंबर तक नहीं दिया जाता। ऐसे में परेशान अभिभावक किसके सामने अपनी समस्या रखें। नाम उजागर करने पर उनके बच्चों को स्कूल वाले परेशान कर देंगे इस लिए अभिभावक अपना और बच्चों का नाम उजागर नहीं करना चाहते। अभिभावकों ने बताया कि यह सिलसिला सालों से चल रहा है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की दो बहनों ने भी इस स्कूल से बारहवीं तक की पढ़ाई की है। लेकिन कभी भी वर्दी और किताबें स्कूल की तरफ से नहीं दी गई थी।
                 अभिभावकों ने सरकार से इस मामले में व्यापक जांच करने की अपील की है। उनका कहना है कि सरकार पब्लिक स्कूलों के पिछले कुछ सालों में कितने गरीब बच्चों को वर्दी और किताबें दी है इसका रिकॉर्ड तो शिक्षा विभाग को दिया ही गया होगा। शिक्षा मंत्री को उस रिकॉर्ड की जांच करानी चाहिए। उन सभी बच्चों के अभिभावकों से निजी रुप से अफसरों को संपर्क करना चाहिए तभी यह सच्चाई मालूम होगी कि कितने बच्चों को वाकई में वर्दी और किताबें स्कूल से मिली थी। सच्चाई पता लगाने के लिए अफसरों को बारहवीं पास कर चुके इस स्कूल के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के उन बच्चों से भी संपर्क करना चाहिए। वह बच्चे अब खुल कर बता सकते हैं कि उनको स्कूल से वर्दी और किताबें मिली थी या नहीं। स्कूलों द्वारा दिखाए गए रिकार्ड में अभिभावकों के हस्ताक्षर की सत्यता की भी जांच करानी चाहिए।
               लोगों का कहना है कि शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया को यह तरीका सभी पब्लिक स्कूल वालों की सच्चाई मालूम करने के लिए अपनाना चाहिए। सरकार द्वारा गरीब बच्चों के लिए भेजे जा रहे पैसे को हड़पने वाले स्कूलों के खिलाफ जालसाजी, धोखाधड़ी और सरकारी रकम हड़पने की एफआईआर दर्ज करानी चाहिए। ऐसे लोगों को जेल भेजा जाना चाहिए। तभी सरकार की योजना का लाभ उन बच्चों को मिल पाएगा।
               सरकार को किताबों और वर्दी के पैसे अभिभावकों के बैंक खातों में सीधे जमा कराने पर विचार करना चाहिए। अगर रकम खाते में जमा कराई जाएं तो इस बात की पुख्ता व्यवस्था की जानी चाहिए कि स्कूल उस तय पैसे से ही उनको वर्दी और किताबें दें। ऐसा इंतजाम नहीं किया गया तो स्कूल फिर अपनी मर्ज़ी की कीमत वर्दी और किताबों की वसूलेगा।
                 अभिभावकों को भी जागरुक और निडर हो कर बच्चों का हक़ हड़पने वाले ऐसे स्कूलों के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। अभिभावकों को स्कूल में किसी भी कागज़ पर हस्ताक्षर करने से पहले उसे अच्छी तरह पढ़ लेना चाहिए कहीं ऐसा न हो कि स्कूल वाले आपसे वर्दी और किताबें सौंपने के कागज़ पर धोखे से हस्ताक्षर करवा लें। जिससे वह अपने रिकॉर्ड में यह दिखा देंगे कि किताबें और वर्दी दे दी गई है।सरकार को स्कूलों को निर्देश देने चाहिए कि वह स्कूल में एक बोर्ड लगाएं जिस पर ग़रीब बच्चों को सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं और योजनाओं की जानकारी दी गई हो।सरकार को ऐसा एक फोन नंबर भी देना चाहिए जिस पर अभिभावक शिकायत कर सकें। शिकायत पर की गई कार्रवाई से भी अभिभावक को अवगत कराया जाए।

About Post Author

Subscribe to get news in your inbox