जलमग्न हो गई वह बस्ती हम जिसपर रीझा करते थे

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जलमग्न हो गई वह बस्ती हम जिसपर रीझा करते थे

-कलमवीर विचार मंच ने किया पावस काव्योत्सव का आयोजन

नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/बहादुरगढ़/शिव कुमार यादव/– कलमवीर विचार मंच द्वारा रविवार को सेक्टर नौ स्थित विवेकानंद पार्क के निकट पावस काव्योत्सव का आयोजन किया गया। लगभग तीन घंटे चले इस कार्यक्रम की अध्यक्षता क्षेत्र के जाने माने साहित्यकार सतपाल स्नेही ने की।

काव्योत्सव का शुभारंभ कौशल समीर की इन पंक्तियों से हुआ-
भला कौन खटखटाएगा मेरी दहलीज,
लगता है यादों की हवा दस्तक दे रही है।

अनिल भारतीय ’गुमनाम’ ने अपनी श्रंगार रस की रचनाओं से मंत्र मुग्ध किया-
जुल्फों की चिलमन के नीचे, छुप-२ रात आती है,
प्यार की लाखों बातें,वह अपने साथ लाती है।
प्रेम की सुबह में जी ले, प्यारे इकरार में,
बागों की बहार में…

सुनीता सिंह ने सावन की मधुर स्मृतियों का उल्लेख करते हुए कहा-
मैंने सावन में मेंहदी रचाई बहुत,
निबौंरियाँ नीम की मैंने खाईं बहुत।
नन्हें कदमों से पानी पे छप-छप किया,
नाव कागज़ की मैंने चलाईं बहुत।

मोहित कौशिक ने युवा प्रेमियों की जीवन शैली को इन शब्दों में व्यक्त किया-
ये जो तुम्हारे साथ काफी हो रही है,
     किसी की चाय से बड़ी नाइंसाफी हो रही है।
     गलती नही गुनाह कर रहे हैं लगातार,
     बेशक कहीं से मुसल्सल माफी हो रही है।

कुमार राघव ने भी श्रंगार रस के कई मुक्तक सुनाए। एक बानगी देखिए-
स्वप्न में कोई सुहानी भोर लेकर चल पड़ा है,
दो दिलों की बेबसी का शोर लेकर चल पड़ा है।
कोशिशें जारी रखूँगा भूल जाने की खुदा को,
प्यार ना जाने मुझे किस ओर लेकर चल पड़ा है।

कार्यक्रम का संचालन कर रहे कृष्ण गोपाल विद्यार्थी ने अपनी रचनाओं में सावन के अनेक शब्द चित्र प्रस्तुत किए।
देश के कई राज्यों में आई बाढ़ पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा-
इस बार घटा ऐसे बरसी, सब स्वप्न हमारे डूब गए
यूँ बाढ़ घरों में घुस आई आंगन गलियारे डूब गए।
जलमग्न हो गई वह बस्ती, हम जिसपर रीता करते थे,
लैला का पनघट और मजनू के मस्त नज़ारे डूब गए।

सतपाल स्नेही ने अपने संबोधन में कौशल समीर व मोहित कौशिक को उनके जन्मदिन की शुभकामनाएं देने के अलावा युवा कवियों की रचनाओं की समीक्षा भी की। एक वृक्ष के बहाने परिवार में पिता की भूमिका को रेखांकित करती उनकी रचना को बेहद सराहा गया।एक अंश देखें-
इन टहनियों से लटक कर ही,
तुम्हारा क़द बढ़ा है।
और इनसे ही,
तुम्हारे घर बुझा चूल्हा जला है।

उनके अध्यक्षीय संबोधन के साथ ही काव्योत्सव का समापन हुआ।

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