दिल्ली में हार के बाद भाजपा में घमासान की संभावना, केजरीवाल को मात नही दे पा रही भाजपा

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दिल्ली में हार के बाद भाजपा में घमासान की संभावना, केजरीवाल को मात नही दे पा रही भाजपा

-कांग्रेस के दिल्ली में कमजोर होने से भाजपा को हो रहा नुकसान, दिल्ली में जीत के लिए भाजपा में फिर शुरू हुआ खामियों पर मंथन

नजफगढ़ मैट्रो न्यूज/नई दिल्ली/शिव कुमार यादव/- दिल्ली की राजेन्द्र नगर विधानसभा पर उपचुनाव में आप की जीत के बाद भाजपा में घमासान की संभावना बढ़ गई है। सियासी हलकों में चर्चा आम हो गई है कि भाजपा ने हर जगह अच्छा प्रदर्शन किया यूपी की दोनो सीटों को सपा के छीन लिया लेकिन दिल्ली में ऐसा क्या है कि भाजपा केजरीवाल को मात नही दे पा रही है। भाजपा अब इस बात पर मंथन कर रही है कि ऐसी कौन सी खामी है जिसे भाजपा के राजनीतिक विशेषज्ञ ढूंढ नही पा रहे है या फिर भाजपा की आंतरिक कलह इसका कारण है..? उपचुनाव में मिली हार ने भाजपा की रणनीति पर भी सवाल खड़े कर दिये है। भाजपा को अब लगने लगा है कि कहीं दिल्ली में कांग्रेस का कमजोर होना तो भाजपा की हार का कारण नही इस पर पार्टी में अब मंथन हो रहा है। क्योंकि दिल्ली में कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही है और चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशी जमानत तक नही बचा पा रहे है।
                भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बेहद मुश्किल माने जाने वाले आजम खान के गढ़ में भी भगवा परचम लहरा दिया है। आजमगढ़ में भी अखिलेश के भाई धर्मेंद्र यादव को हरा दिया। लेकिन दिल्ली में क्यों बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा? कुछ इसी तरह के सवाल दिल्ली में बीजेपी के समर्थक और पार्टी के कई नेता पूछ रहे हैं। राजेंद्र नगर सीट पर उपचुनाव में हार के बाद दिल्ली भाजपा में घमासान के आसार बढ़ गए हैं। कई नेताओं ने दबी जुबान में तो कुछ ने खुलकर प्रदेश नेतृत्व पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

 दिल्ली में राजेंद्र नगर सीट पर हुए उपचुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को 11 हजार से अधिक वोटों से हरा दिया है। पहली नजर में भाजपा नेता और समर्थक इसे महज एक सीट पर उपचुनाव की हार कहकर नजरअंदाज कर सकते हैं, लेकिन 2020 विधानसभा चुनाव के बाद यह भगवा दल की पहली हार नहीं है। करीब ढाई दशक से दिल्ली की सत्ता से दूर भाजपा को दिल्ली के दंगल में बार-बार पटखनी मिल रही है। पिछले 2 साल में ही बीजेपी को एमसीडी और विधानसभा की 6 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा है, जिसमें से 5 पर ’आप’ ने पटका है।  
               राजेंद्र नगर उपचुनाव में आम आदमी पार्टी की चुनावी रणनीति सफल रही। आप ने आक्रामक चुनाव प्रचार किया। पार्टी प्रत्याशी और मंत्रियों के साथ खुद पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने मोर्चा संभाला। मुख्यमंत्री ने राजेंद्रनगर में लगातार रोड शो किए। आप ने मुख्यमंत्री के चेहरे और दिल्ली में अपने काम के नाम पर वोट मांगा। यही नहीं, बूथ मैनेजमेंट में भी आप अन्य दलों पर भारी पड़ी। बूथस्तर पर आप कार्यकर्ताओं को लगाया गया। माइक्रो मैनेजमेंट के जरिए पार्टी अपने वोटरों को बूथ पर लेकर गई।

भाजपा की रणनीति पर सवाल
उपचुनाव में हार से भाजपा की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं। भाजपा चुनाव के दौरान स्थानीय मुद्दों की जगह मुख्यमंत्री को घेरने के प्रयास में लगी रही, लेकिन यह सफल नहीं हुआ।

दिल्ली की सियासत में आप की पकड़ मजबूत
राजेंद्र नगर उपचुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो साफ है कि दिल्ली की सियासत में आप का दबदबा कायम है। आप प्रत्याशी को 55 फीसदी से ज्यादा वोट मिले।

कांग्रेस के कमजोर होने से बीजेपी को नुकसान
दिल्ली में भाजपा का मत प्रतिशत तीस से चालीस फीसदी के बीच घूमता है। भाजपा की उम्मीदें वोटों के बंटवारे पर टिकी थीं। लेकिन, कांग्रेस प्रत्याशी को करीब पौने तीन फीसदी मत मिलने से भाजपा को इसका बहुत लाभ नहीं हो पाया।

सियासी तस्वीर से गायब हुई कांग्रेस
राजेंद्रनगर उपचुनाव में कांग्रेस ने प्रेमलता पर दांव लगाया था, लेकिन उनकी जमानत जब्त हो गई। कांग्रेस प्रत्याशी को मात्र 2014 मत हासिल हुए। उपचुनाव के नतीजों से साफ है कि राजधानी के सियासी समीकरणों में कांग्रेस के लिए दिल्ली दूर है। वहीं, वोटों का बंटवारा नहीं होने से भाजपा के लिए भी मुश्किल बढ़ गई है।

स्थानीय और पंजाबी का मुद्दा नहीं चला
राघव चड्ढा के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीट पर पंजाबी और स्थानीय का मुद्दा भी उठाने का प्रयास हुआ। भाजपा ने चुनाव में अपने प्रत्याशी राजेश भाटिया के स्थानीय होने को मुद्दा बनाया और आप प्रत्याशी को बाहरी बताया। यहां पंजाबी वोटर बड़ी संख्या में हैं। भाजपा को उम्मीद थी कि उन्हें बड़ी संख्या में पंजाबी वोटर मिलेंगे, लेकिन आप ने पंजाबी वोट भी हासिल किए।
                राजेंद्र नगर विधानसभा सीट पर उपचुनाव से पहले भाजपा को पिछले साल मार्च में भी एमसीडी की पांच सीटों पर उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। यहां तक की शालीमार बाग जैसे गढ़ में भी पार्टी को शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। शालिमार बाग के अलावा ’आप’ ने रोहिणी सी, त्रिलोकपुरी और कल्याणपुरी में जीत हासिल की थी। वहीं, जौहान बांगर सीट पर कांग्रेस ने जीत हासिल की थी।

एमसीडी चुनाव पर होगा असर?
हाल ही में केंद्र की बीजेपी सरकार ने तीनों एमसीडी का एकीकरण किया है और इस वजह से चुनाव में देर हो चुकी है। राजधानी में जल्द ही नगर निगम चुनाव हो सकते हैं। राजेंद्र नगर सीट पर जीत से उत्साहित ’आप’ नेताओं ने बीजेपी को एमसीडी चुनाव कराने की चुनौती देना शुरू कर दिया है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो इस हार ने भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। काडर का मनोबल कमजोर होने से भाजपा को एमसीडी चुनाव में भी नुकसान की आशंका है।
                राजेंद्र नगर में पार्टी हार के बाद रविवार को दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष आदेश गुप्ता ने उम्मीदवार राजेश भाटिया को ’स्नेह और आशीर्वाद’ के लिए जनता का आभार जताया। उन्होंने कहा, ’’हार-जीत लोकतंत्र का अभिन्न अंग है, भाजपा इस जनादेश का सम्मान करती है। हमारे कार्यकर्ता इस चुनाव की भांति आगे भी और अधिक बल के साथ रणक्षेत्र में उतरेंगे।’’

देशभर में जीत, दिल्ली में क्यों हार?
इस बीच पार्टी के समर्थकों और नेताओं में निराशा साफ देखी जा सकती है। कुछ नेताओं ने तो सोशल मीडिया पर भी अपनी राय जाहिर की है। पूर्व मीडिया पैनलिस्ट और बीजेपी नेता राहुल त्रिवेदी ने ट्वीट किया, ’’दिल्ली बीजेपी को आत्ममंथन की जरूरत है। क्या वजह है कि हम देश के हर कोने में चुनाव जीत रहे हैं। लेकिन दिल्ली में हमें सिर्फ हार मिलती है। पार्टी और जनता के बीच में दूरी बढ़ रही है, जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।’’ एक अन्य कार्यकर्ता केएस दुग्गल ने लिखा, ’’राजेंद्र नगर विधानसभा उपचुनाव में हार के बाद मंथन वाली बैठकों की नहीं, बल्कि ऐक्शन लेने की जरूरत है।’’

’बदलनी होगी रणनीति’
इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में भी कुछ नेताओं ने रणनीति में बदलाव की बात कही है। एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ’’झुग्गियों और अनऑथराइज्ड कॉलोनियों में लोकल लीडरशिप तैयार करने की जरूरत है। हम सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं रह सकते हैं कि बड़े नेता रोड शो करेंगे और लोग बड़ी संख्या में हमें वोट कर देंगे। केवल प्रदर्शन और पंपलेट बांटने पर निर्भर रहने वाले दिन बीत गए। स्टेट यूनिट में जनता से जुड़ने के लिए नए प्रयोग की कमी है। हम जनता के लिए विकल्प प्रस्तुत करने की बजाय केजरीवाल पर आरोप लगाते रहते हैं।’’

’प्रचार अभियान में खामी’
एक अन्य नेता ने कहा, ’’इस बात को सोचने की जरूरत है कि कैसे बीजेपी आजम खान और अखिलेश यादव के गढ़ में जीत गई, लेकिन दिल्ली में उसे लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है। राजेंद्र नगर सीट पर प्रचार टीम का हिस्सा रहे एक नेता ने कहा कि पार्टी का युवाओं से कनेक्ट नहीं रहा। उन्होंने कहा, ’’स्टेट यूनिट ने प्रचार अभियान का  ठीक से प्रबंधन नहीं किया। पानी आपूर्ति को लेकर जनता में काफी शिकायतें थीं, लेकिन हम उन्हें यह विश्वास दिलाने में नाकाम रहे कि बीजेपी कैसे इस संकट को दूर करेगी।’’

’पार्टी के वोटर्स रह गए बूथ से दूर’
कम वोटिंग की ओर इशारा करते हुए नेता ने कहा कि पार्टी समर्थकों को घर से बूथ तक पहुंचाने पर और अधिक काम करने की जरूरत थी। आप ने इस मामले में बेहतर काम किया। उन्होंने अपने किसी वोटर को घर में नहीं रहने दिया। लेकिन बीजेपी के बहुत से वोटर घर से निकले नहीं। उन्होंने कहा, ’’राजेंद्र नगर, न्यू राजेंद्र नगर, नारायणा और इंदरपुरी के कुछ इलाकों में वोटिंग बेहद कम रही, जहां भाजपा मजबूत है।’’ गौरतलब है कि उपचुनाव में महज 43.75 फीसदी वोटिंग हुई, जबकि 2020 में 58.72 फीसदी वोटर्स ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था।

लोकसभा चुनाव में दिल्ली ने भाजपा को दिल खोलकर दिया वोट
भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि लोकसभा चुनाव में दिल्ली ने उसे दिल खोलकर वोट दिया है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सभी सात सीटों पर कब्जा जमाया है। पिछले लोकसभा चुनाव में चांदनी चौक से हर्षवर्धन, पूर्वी दिल्ली से पूर्व क्रिकेटर गौतम गंभीर, नई दिल्ली से मीनाक्षी लेखी, उत्तर पूर्वी दिल्ली से मनोज तिवारी, उत्तर पश्चिमी दिल्ली से हंस राज हंस, दक्षिणी दिल्ली से रमेश बिधूड़ी और पश्चिमी दिल्ली से प्रवेश साहिब सिंह वर्मा ने जीत हासिल की थी। इन सभी नेताओं को 52 से लेकर 60 फीसदी वोट शेयर हासिल हुआ था।

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