

नजफगढ़ मेट्रो न्यूज/नई दिल्ली/राज्य ब्यूरो: छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाले में कार्रवाई की रफ्तार अब एक नए सवाल पर आकर ठहर गई है। आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) और एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने 14 अक्टूबर को विशेष न्यायालय में अपर आयुक्त आबकारी आशीष श्रीवास्तव के खिलाफ चालान पेश कर दिया, लेकिन 16 अक्टूबर तक उनके निलंबन का आदेश सामने नहीं आया। सवाल यह है कि भ्रष्टाचार के इसी मामले में जब पहले 22 सेवारत अधिकारियों के खिलाफ चालान पेश होने पर शासन ने उसी दिन निलंबन की कार्रवाई कर दी थी, तो इस बार इंतजार किस बात का है?
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यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला किसी सामान्य विभागीय अनियमितता का नहीं, बल्कि राज्य के बहुचर्चित शराब घोटाले का है। चालान पेश होने के बाद आशीष श्रीवास्तव के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर शासन की अगली पहल पर निगाहें टिकी हैं। एक तरफ जांच एजेंसियां मामले को अदालत तक पहुंचा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ संबंधित अधिकारी के निलंबन का आदेश जारी नहीं होने से प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं।

22 अधिकारियों पर उसी दिन कार्रवाई,अब देरी ?
इस प्रकरण में पहले 29 अधिकारियों के नाम आरोपपत्र में शामिल किए गए थे। उपलब्ध विवरण के अनुसार, 7 जुलाई 2025 को चालान पेश होने के दिन ही इनमें से 22 सेवारत अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया था। उस समय शासन ने कार्रवाई में देर नहीं की। अब आशीष श्रीवास्तव के मामले में चालान पेश होने के दो दिन बाद भी निलंबन आदेश सामने नहीं आने से दोनों परिस्थितियों की तुलना स्वाभाविक है।
क्या शासन इस मामले में भी वही नियम और वही कसौटी लागू करेगा, जो पहले अधिकारियों के मामले में अपनाई गई थी? यदि नियम एक है और मामला भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा है, तो कार्रवाई की समयसीमा अलग-अलग क्यों दिखाई दे रही है? यही वे सवाल हैं, जिनका जवाब आबकारी विभाग और शासन को देना चाहिए।
नियम में निलंबन का स्पष्ट प्रावधान
छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के नियम 9(1) में आपराधिक मामले की जांच, पूछताछ या विचारण के दौरान शासकीय सेवक को निलंबित करने का प्रावधान है। इसके परंतुक में भ्रष्टाचार अथवा नैतिक अधमता से जुड़े अपराध में चालान पेश होने पर शासकीय सेवक को अनिवार्य रूप से निलंबित किए जाने की बात कही गई है।
ऐसे में आशीष श्रीवास्तव के मामले में शासन की स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है। क्या निलंबन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है? यदि हां, तो आदेश जारी होने में देरी क्यों हो रही है? और यदि प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है, तो उसके पीछे क्या कारण हैं? इन सवालों पर विभागीय स्तर से स्पष्ट जवाब सामने आना चाहिए।
निलंबन और गिरफ्तारी अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। इसी तरह किसी अधिकारी के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज होने, अभियोजन की अनुमति मिलने और चालान पेश होने की स्थिति भी अलग-अलग हो सकती है। इसलिए इन सभी पहलुओं पर आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होना जरूरी है। हालांकि, निलंबन के मामले में नियम का प्रावधान और पहले की गई कार्रवाई शासन के सामने जवाबदेही का सवाल जरूर खड़ा करती है।
पहले भी उठे थे कमाई, लेन-देन पर सवाल
आशीष श्रीवास्तव को लेकर इससे पहले प्रकाशित रिपोर्ट में जांच से जुड़े सूत्रों के हवाले से कथित आर्थिक लेन-देन और आय से संबंधित गंभीर दावे सामने आए थे। उस रिपोर्ट में प्रवर्तन निदेशालय से जुड़े कथित 54 लाख रुपये के आंकड़े और ईओडब्ल्यू की जांच से संबंधित बताए गए करीब दो करोड़ रुपये के आंकड़े का उल्लेख किया गया था। साथ ही, कथित तौर पर हर महीने छह लाख रुपये तक के लेन-देन का दावा भी सामने आया था।
इन आंकड़ों का आधार, अवधि और आधिकारिक अभिलेखों से उनकी पुष्टि सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है। इसलिए इन्हें स्थापित तथ्य के बजाय जांच की पुष्टि के अपेक्षित दावों के रूप में देखा जाना चाहिए। फिर भी, शराब घोटाले की जांच में संबंधित अधिकारी की भूमिका को लेकर उठ रहे सवालों के बीच इन दावों की स्थिति स्पष्ट करना जांच एजेंसियों और शासन के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रभावशाली अधिकारी, कार्रवाई में देरी क्यों ?
प्रशासनिक हलकों में इस मामले को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं होने की बात सामने आ रही है। यह भी चर्चा है कि अधिकारी को निलंबन से बचाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इसे किसी स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। शासन की ओर से स्पष्ट जवाब नहीं आने तक इन चर्चाओं पर विराम लगाना भी संभव नहीं दिखता।
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़े अधिकारियों पर कार्रवाई का पैमाना पद, प्रभाव और परिस्थितियों के हिसाब से बदल जाता है? पहले 22 अधिकारियों को चालान पेश होने के दिन निलंबित किया गया था। अब आशीष श्रीवास्तव के मामले में आदेश का इंतजार है। ऐसे में शासन को केवल कार्रवाई की जानकारी ही नहीं, बल्कि देरी के कारण भी स्पष्ट करने चाहिए।
शराब घोटाले में चालान पेश होना जांच की समाप्ति या आरोपों के न्यायिक रूप से सिद्ध हो जाने का प्रमाण नहीं है। इसका फैसला अदालत में होगा। लेकिन शासन के स्तर पर नियमों का समान अनुपालन सुनिश्चित करना अलग जिम्मेदारी है। अब देखना यह है कि शासन इस मामले में कब तक निर्णय लेता है और क्या पहले अधिकारियों के मामले में अपनाई गई कसौटी यहां भी लागू होती है।





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