1984 सिख विरोधी दंगों के 42 साल बाद भी इंसाफ का इंतजार, तिलक विहार में आज भी जिंदा हैं जख्म

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1984 सिख विरोधी दंगों के 42 साल बाद भी इंसाफ का इंतजार, तिलक विहार में आज भी जिंदा हैं जख्म

तिलक विहार स्थित गुरुद्वारा शहीदगंज साहिब में हर साल 1984 के सिख विरोधी दंगों में जान गंवाने वालों को याद किया जाता है.

 

नजफगढ़ मेट्रो न्यूज/नई दिल्ली/ ब्यूरो,: राजधानी दिल्ली के तिलक विहार स्थित गुरुद्वारा शहीदगंज साहिब में 1 से 3 नवंबर तक माहौल गमगीन रहता है. यहां हर साल 1984 के सिख विरोधी दंगों में जान गंवाने वालों को याद किया जाता है. विडो कॉलोनी के नाम से पहचाने जाने वाले इस इलाके की गलियों में आज भी उस हिंसा की दर्दनाक यादें मौजूद हैं. किसी ने पिता खोया,
किसी ने भाई, तो किसी का पूरा परिवार उजड़ गया. चार दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद पीड़ित परिवारों की आंखों में अपनों को खोने का दर्द और इंसाफ मिलने की उम्मीद आज भी बाकी है.
गुरुद्वारा परिसर में बने म्यूजियम में दंगों में मारे गए लोगों की तस्वीरें लगाई गई हैं. इन तस्वीरों के सामने खड़े होकर पीड़ित परिवार अपने उन अपनों को याद करते हैं, जिन्हें हिंसा ने उनसे हमेशा के लिए छीन लिया. हर तस्वीर के पीछे एक ऐसी कहानी है, जिसे सुनकर आज भी रूह कांप जाती है.
नौकरी का पहला दिन देखने से पहले ही छिन गई जिंदगी
निर्मल कौर बताती हैं कि उनके देवर गांव से नौकरी की तलाश में दिल्ली आए थे. 1 नवंबर को उन्हें नई नौकरी ज्वाइन करनी थी, लेकिन इससे पहले ही उनकी हत्या कर दी गई. उन्होंने रुंधे गले से बताया कि उनके देवर पढ़े-लिखे और होनहार थे. मंगोलपुरी थाने में आग के हवाले कर उन्हें मार दिया गया. परिवार को आज तक उनका शव भी नहीं मिल सका. निर्मल कौर हर साल गुरुद्वारे पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि देती हैं.
रजनी कौर ने भी उस भयावह मंजर को याद किया. उन्होंने बताया कि उनके 60 वर्षीय नंदोई और 18 वर्षीय भतीजे को भीड़ खींचकर ले गई थी. हमले से पहले ही उपद्रवियों ने पेट्रोल, पुराने टायर, बोतलें और हथियार जुटा लिए थे. परिवार के लोग तीन दिनों तक घर में रखे टीन के बक्सों में छिपकर अपनी जान बचाते रहे. उनका कहना है कि आज भी सभी दोषियों को सजा नहीं मिली है और सरकार को जल्द से जल्द कार्रवाई करनी चाहिए.
पिता को बचाने के लिए पहनाना पड़ा महिलाओं का सूट
दंगों के प्रत्यक्षदर्शी गुरप्रीत ने बताया कि 31 अक्टूबर और उसके बाद के दिन उनके परिवार के लिए कभी न भूलने वाला दर्द बन गए. हिंसा में उन्होंने अपने पिता और मामा को खो दिया. पिता की जान बचाने के लिए उन्हें महिलाओं का सूट पहनाया गया और तीन दिनों तक गेहूं रखने वाले टीन के डिब्बे में छिपाकर रखा गया. वहीं, जसमीत कौर ने बताया कि हिंसा में उनके परिवार के 11 सदस्यों की जान चली गई थी. 31 अक्टूबर की रात मचे हंगामे के बाद सुबह होते ही लोगों को घरों से खींचकर ले जाया जाने लगा. बच्चों तक को नहीं बख्शा गया. जसमीत की मांग है कि उनके परिवार को उजाड़ने वालों को कड़ी सजा मिले और सरकार पीड़ित परिवारों की समस्याओं पर ध्यान दे.
अनाथ हुए, पढ़ाई छूटी, संपत्ति पर भी हुआ कब्जा
करतार सिंह आज भी उस खौफनाक मंजर को याद कर भावुक हो जाते हैं. उन्होंने बताया कि तुगलकाबाद में उनके फूफा और बड़े पापा गाड़ी साफ कर रहे थे, तभी उन पर तलवारों से हमला कर दिया गया. इसके बाद घर में टायर डालकर आग लगा दी गई. करतार सिंह के मुताबिक, इस घटना के बाद उनका परिवार पूरी तरह बिखर गया. वे अनाथ हो गए और पढ़ाई भी पूरी नहीं कर सके. इतना ही नहीं, गांव में परिवार की करीब 50 बीघा जमीन पर भी अवैध कब्जा हो गया. उनका कहना है कि उस घटना का असर आज भी उनकी जिंदगी और मानसिक स्थिति पर बना हुआ है.
‘न भूले हैं, न भूलेंगे’, बोले चरणजीत सिंह लवली
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और स्थानीय संघर्ष से जुड़े चरणजीत सिंह लवली ने कहा कि सिख समुदाय 1984 के नरसंहार को कभी नहीं भूल सकता. गुरुद्वारा शहीदगंज साहिब में हर साल 1 से 3 नवंबर तक मृतकों को श्रद्धांजलि दी जाती है. उन्होंने आरोप लगाया कि यह हिंसा सुनियोजित थी और वोटर लिस्ट के जरिए सिख परिवारों के घरों की पहचान की गई थी. लवली ने कहा कि उस दौरान महिलाओं के साथ अत्याचार किए गए और हजारों लोगों की जान गई. त्रिलोकपुरी, मंगोलपुरी, सुल्तानपुरी और यमुनापार के कई इलाके हिंसा से बुरी तरह प्रभावित हुए थे. उन्होंने कहा कि सिख समुदाय का संदेश साफ है- ‘न भूले हैं, न भूलेंगे.’
मुआवजे से ज्यादा सम्मानजनक जिंदगी और इंसाफ की मांग
तिलक विहार में रहने वाले पीड़ित परिवारों का कहना है कि इतने साल बीत जाने के बाद भी उनकी समस्याओं का पूरी तरह समाधान नहीं हुआ है. परिवारों के कमाने वाले सदस्यों को खोने के बाद महिलाओं को बच्चों की परवरिश और घर चलाने के लिए संघर्ष करना पड़ा. कई परिवार आज भी आर्थिक तंगी और रोजगार की कमी से जूझ रहे हैं. पीड़ितों का कहना है कि पांच लाख रुपये या छोटी-मोटी आर्थिक सहायता से उनके परिवारों को हुए नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती. उन्हें सिर्फ मुआवजा नहीं, बल्कि स्थायी आर्थिक सहायता, रोजगार के अवसर और दोषियों को सजा मिलने का इंतजार है. तिलक विहार की ये कहानियां बताती हैं कि 1984 की हिंसा का दर्द इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि आज भी कई परिवारों की जिंदगी का हिस्सा बना हुआ है.

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