वह सावन…..और यह सावन!

स्वामी,मुद्रक एवं प्रमुख संपादक

शिव कुमार यादव

वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी

संपादक

भावना शर्मा

पत्रकार एवं समाजसेवी

प्रबन्धक

Birendra Kumar

बिरेन्द्र कुमार

सामाजिक कार्यकर्ता एवं आईटी प्रबंधक

Categories

January 2026
M T W T F S S
 1234
567891011
12131415161718
19202122232425
262728293031  
January 19, 2026

हर ख़बर पर हमारी पकड़

वे झूले… पंछी, वह कच्चा आंगन!
अब… कंक्रीट के जंगल हैं..
खो गई महक वह.. मनभावन!

विनीता जॉर्ज
मरवाही छत्तीसगढ़

सावन आ गया है और बरस भी रहा है, जैसे बरसता आया है पर वह त्योहारी शिद्दत वह रिश्तों की हरियाली बरगद, नीम की वह डाली और झूले पर वह ऊंची पींग..सावन मल्हार गीतों की सरगम अब किस्सा हो गई है..
गांव उठकर शहर आ गया रोजी रोटी की टोह में जिंदगी  हलकान हो गई रिश्ते भी बिखरने लगे सब अपने भीतर खो गए!

कच्चे आंगन…पक्के रिश्ते
पक्के घर में फिसले रिश्ते!

 बचपन में जिसे सावन देखा नैसर्गिक.. अब बनावटी हो चला है।  रिमझिम की पहली फुहार आई नहीं कि माटी महक महक कर सोंधेपन का संदेश देती थी। कि लो कुदरत के श्रृंगार का मौसम आ गया है बहन बेटियों के मायके लौटने का उल्लास, जवांई राजाओं के लिए खीर खांड के ससुराल से निमंत्रण यानी कुदरत की हरियाली के संग एकाकार होने की मतवाली उमंग चहुंओर खनकती थी। बेशक तब आंगन कच्चे थे, पर रिश्तो के तार पक्के थे। दादी पहली रोटी गाय के लिए तो आखिरी गली के श्वान मोती के लिए पकाती। मुंडेर पर बोलता काग घर में आने वाले मेहमान का संदेशवाहक बन जाता। और उसके लिए मनुहार गीत बन जाती

उड़ उड़ रे म्हारे काला रे कागला
कद म्हारा पीवजी घर आवै
खीर खांड का भोजन कराऊं
सोने सूं चोंच मंडवाऊ कागा..!

अब कागा के दर्शन दुर्लभ!
अब सावन में मेहमान के आने का अंदेशा काग नहीं देता.. मोबाइल पर औपचारिकता सावन बधाई की चलती है। वीडियो पर परछाइयां देख हिया को दिलासा दी जाती है कि राखी का कूरियर मिल गया न! एक लोकगीत याद आ गया…
सावन सूना बहना मेरी लगि रह्यै..
भैया कब आवै मोरे द्वार!

About Post Author

आपने शायद इसे नहीं पढ़ा

Subscribe to get news in your inbox