राष्ट्रपति द्रोपति मुर्मू का बड़ा फैसला, दरबार और अशोक हॉल के बदले जाएंगे नाम

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August 18, 2026

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राष्ट्रपति द्रोपति मुर्मू का बड़ा फैसला, दरबार और अशोक हॉल के बदले जाएंगे नाम

नई दिल्ली/अनीशा चौहान/-  राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बड़ा फैसला लेते हुए राष्ट्रपति भवन के दो महत्वपूर्ण हॉल ‘दरबार हॉल’ और ‘अशोक हॉल’ के नाम बदलने का फैसला किया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दरबार हॉल का नाम बदलकर गणतंत्र मंडप और अशोक हॉल का नाम बदलकर अशोक मंडप कर दिया है। बताया जा रहा है कि राष्ट्रपति भवन ने दोनों हॉल के नाम बदलने को लेकर एक बयान जारी किया है। वहीं, इसे लेकर विपक्ष भी सामने आ रहा है, कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा, ”दरबार की कोई अवधारणा नहीं है, लेकिन ‘शहंशाह’ की अवधारणा है।’

राष्ट्रपति सचिवालय की ओर से जारी बयान में कहा गया, ‘लोगों के लिए इसे और अधिक सुलभ बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। “राष्ट्रपति भवन के माहौल को भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और लोकाचार को प्रतिबिंबित करने वाला बनाने के लिए निरंतर प्रयास किए गए हैं।” बयान के मुताबिक, इसी क्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति भवन के दो महत्वपूर्ण हॉल- ‘दरबार हॉल’ और ‘अशोक हॉल’ का नाम बदलकर क्रमश: ‘गणतंत्र मंडप’ और ‘अशोक मंडप’ करने से खुश हैं।

राष्ट्रीय पुरस्कारों की प्रस्तुति जैसे महत्वपूर्ण समारोहों और कार्यक्रम के आयोजन का स्थान

‘दरबार हॉल’ राष्ट्रीय पुरस्कारों की प्रस्तुति जैसे महत्वपूर्ण समारोहों और कार्यक्रमों के आयोजन का स्थान है। बयान में कहा गया, ‘दरबार’ शब्द का तात्पर्य भारतीय शासकों और ब्रिटिश अदालतों और सभाओं से है। भारत के गणतंत्र बनने के बाद न्यायालय की प्रासंगिकता समाप्त हो गई। ‘गणतंत्र’ की अवधारणा प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में गहराई से निहित है। ‘गणतंत्र मंडप’ आयोजन स्थल के लिए एक उपयुक्त नाम है।

‘अशोक’ शब्द का अर्थ है ‘सभी दुखों से मुक्त’ या ‘किसी भी दुख से रहित’

बयान के अनुसार, ‘अशोक’ शब्द का अर्थ है ‘सभी दुखों से मुक्त’ या ‘किसी भी दुख से रहित’ और इसके अलावा, ‘अशोक’ का तात्पर्य एकता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के प्रतीक सम्राट अशोक से है। बयान में आगे कहा गया, ‘अशोक स्तंभ भारत गणराज्य का एक राष्ट्रीय प्रतीक है।’

‘मंडप’ भाषा में एकरूपता लाता है’

इसके मुताबिक, ‘अशोक हॉल’ का नाम बदलकर ‘अशोक मंडप’ कर दिया गया है। ‘मंडप’ भाषा में एकरूपता लाता है और ‘अशोक’ शब्द से जुड़े मूल मूल्यों को बरकरार रखते हुए अंग्रेजीकरण संस्कृति के निशान को हटाता है।

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