महाशिवरात्रि 2026: जानिए शिवजी के गले में विराजमान नाग का रहस्य

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महाशिवरात्रि 2026: जानिए शिवजी के गले में विराजमान नाग का रहस्य

-महाशिवरात्रि पर क्यों गले में सांप धारण करते हैं भगवान शिव, और इसका धार्मिक महत्व क्या है?

नई दिल्ली/सिमरन मोरया/-  हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि के पर्व का विशेष महत्व है। इस पर्व भगवान शिव को समर्पित है, जहां भक्त उनकी आराधना करते है। शिवजी का रूप हमेशा से ही आकर्षण का केंद्र रहा है – उनके माथे पर चंद्रमा, जटाओं में गंगा और गले में लिपटा हुआ एक विषैला नाग। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह नाग कौन है और शिवजी ने इसे अपने गले का आभूषण क्यों बनाया? तो चलिए इस रहस्य के पीछे की पौराणिक कथा के बारे में जानते है।

समुद्र मंथन से शुरू हुई वासुकी की यात्रा
हिंदू पुराणों के अनुसार, देवताओं और असुरों के बीच अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन हुआ। इस मंथन में मंदराचल पर्वत को मथनी के रूप में इस्तेमाल किया गया, लेकिन रस्सी की जरूरत पड़ी। तब नागों के राजा वासुकी ने खुद को रस्सी बनने की पेशकश की। एक तरफ देवता और दूसरी तरफ असुरों ने वासुकी को पकड़कर समुद्र को मथा। इस प्रक्रिया में वासुकी का शरीर घायल हो गया, लेकिन उन्होंने अपनी भक्ति में कोई कमी नहीं आने दी।

मंथन के दौरान सबसे पहले हलाहल नामक घातक विष निकला, जो पूरे ब्रह्मांड को नष्ट करने की क्षमता रखता था। जिससे देवता और असुर भयभीत हो गए। तब भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए उस विष को पी लिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। कथा के अनुसार, वासुकी ने भी इस विष का कुछ हिस्सा ग्रहण किया और शिवजी की सहायता की। वासुकी की इस निस्वार्थ भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें अपने गले में धारण करने का वरदान दिया। तभी से वासुकी अमर हो गए और शिव के निकट रहने लगे।

वासुकी को शेषनाग का भाई माना जाता है और वे नागलोक के राजा हैं। पुराणों में वर्णित है कि वासुकी की इच्छा थी कि वे सदैव शिवजी के समीप रहें। शिव पुराण और स्कंद पुराण में इस संबंध का उल्लेख मिलता है, जहां नाग को शिव के आभूषण के रूप में दर्शाया गया है।

नाग क्यों दर्शाता है शिव की शक्ति?
शिवजी के गले में नाग केवल एक कथा नहीं, बल्कि गहन प्रतीक है। नाग विषैला और भयानक प्राणी है, जो मृत्यु और भय का प्रतीक माना जाता है। शिव द्वारा इसे गले में धारण करना दर्शाता है कि उन्होंने मृत्यु, समय और भय पर विजय प्राप्त कर ली है। साथ ही, यह अहंकार और इच्छाओं पर नियंत्रण का संदेश देता है – जैसे नाग को वश में कर लिया गया हो। ज्योतिष में, शिव के साथ नाग की पूजा से कालसर्प दोष और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।

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