नई दिल्ली/सिमरन मोरया/- भारत ने सिंधु जल संधि को लेकर एक बड़ा कदम उठाया है। पिछले हफ्ते पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद, भारत ने इस 65 साल पुरानी संधि पर एक तरह से रोक लगा दी है। विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा है कि पाकिस्तान जब तक सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता, तब तक इस संधि को स्थगित रखा जाएगा।
भारत के पाकिस्तान में पूर्व उच्चायुक्त, अनुभवी राजनयिक और रणनीतिक विचारक, राजदूत सतीश चंद्र का कहना है कि यह संधि अब लगभग खत्म हो चुकी है। स्ट्रेट न्यूज ग्लोबल के साथ एक बातचीत में राजदूत चंद्र ने बताया कि ऐसा क्यों है? उन्होंने कहा कि सिंधु बेसिन का लगभग 40% हिस्सा भारत के पास है। लेकिन संधि के तहत, भारत पाकिस्तान को 80% तक पानी दे रहा है, और अपने लिए केवल 20% रख रहा है।
भारत को अधिक पानी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ
सतीश चंद्र आगे कहते हैं कि सबको यह समझना चाहिए कि विभाजन के समय पश्चिमी पंजाब (जो अब पाकिस्तान में है) में लगभग 140 नहरें थीं। वहीं, पूर्वी पंजाब (जो अब भारत में है) में मुश्किल से 12 नहरें थीं। एक और आंकड़ा है: पाकिस्तान में लगभग 21 मिलियन एकड़ जमीन सिंचित थी, जबकि भारत में केवल 5 मिलियन एकड़। राजदूत चंद्र के अनुसार, इस संधि को निष्पक्ष होने के लिए, भारत को सिंचाई के लिए और अधिक पानी की मांग करनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
जकात पर जीवित पाकिस्तान?
इसके अलावा, भारत ने 1961 में पाकिस्तान को दस साल की अवधि में $175 मिलियन दिए। उन्हें सिंधु बेसिन फंड में $900 मिलियन भी मिले, जो अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों और दाता देशों द्वारा दिया गया था। इसमें से लगभग $450 मिलियन अमेरिका ने दिए थे। भारत भी दूसरा सबसे बड़ा दाता था। इस पैसे से पाकिस्तान ने दो बड़े बांध और कई नहरें बनाईं। वो भी भारत के पैसे से!
भारत ने आखिरकार कड़ा फैसला लिया
इसलिए राजदूत सतीश चंद्र खुश हैं कि भारत ने आखिरकार कड़ा फैसला लिया और पाकिस्तान को उस जगह पर चोट पहुंचाई जहां उन्हें मध्यम और लंबी अवधि में नुकसान होगा, भले ही तुरंत न हो। वे कहते हैं कि यह इतिहास का एक ऐसा हिस्सा है जो आम नागरिकों से छिपा हुआ है।


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