पाकिस्तानी सेना की बर्बरता से दहली तिराह घाटी, 30 मासूमों की मौत ने उठाए गंभीर सवाल

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May 8, 2026

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पाकिस्तानी सेना की बर्बरता से दहली तिराह घाटी, 30 मासूमों की मौत ने उठाए गंभीर सवाल

इस्लामाबाद/तिराह घाटी:
मानसी शर्मा /- पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत स्थित तिराह घाटी में हुई एक दिल दहला देने वाली घटना ने न केवल स्थानीय लोगों को हिला दिया है, बल्कि पूरी दुनिया का ध्यान पाकिस्तान की सैन्य नीतियों की ओर खींचा है। पाकिस्तानी वायु सेना द्वारा किए गए कथित हवाई हमलों में 30 निर्दोष नागरिकों की जान चली गई, जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे और महिलाएं शामिल थीं।

इस नृशंस हमले के बाद पूरे पाकिस्तान, खासकर आफरीदी कबीले में जबरदस्त आक्रोश देखने को मिल रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरें और वीडियो इंसानियत को झकझोर देने वाले हैं — मासूम बच्चों की लाशों को देखकर लोग सवाल कर रहे हैं:
“क्या ये बच्चे भी आतंकवादी थे?”

पाक सेना के खिलाफ जनता का गुस्सा

जिस जनता ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत से सवाल पूछे थे, वही अब अपने ही हुक्मरानों से जवाब मांग रही है। सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, मानवाधिकार संगठनों ने पाकिस्तान सरकार और सेना की जवाबदेही तय करने की मांग की है। स्थानीय लोग कह रहे हैं कि यह हमला किसी सैन्य कार्रवाई का हिस्सा नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा नरसंहार है।

झूठे नैरेटिव से दबाया जा रहा है सच?

पाकिस्तानी मीडिया और सैन्य प्रवक्ताओं की ओर से अब तक कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं आया है। कुछ रिपोर्टों में इस घटना को “आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई” बताया गया, मगर स्थानीय लोगों और स्वतंत्र सूत्रों का दावा है कि मरने वाले सभी निर्दोष आम नागरिक थे।

मानवाधिकार कार्यकर्ता भी अब खुलकर बोल रहे हैं:

“सरकार और सेना कितने भी झूठे दावे कर लें, मगर बच्चों की लाशें सबूत हैं कि यहाँ कुछ ग़लत हुआ है। दुनिया को अब सच देखना और समझना होगा।”

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उठी आवाज़

संयुक्त राष्ट्र के कुछ प्रतिनिधियों और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं ने इस घटना पर चिंता जताई है। कुछ संगठनों ने स्वतंत्र जांच की मांग भी की है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय दबाव नहीं बना, तो पाकिस्तान में इस तरह के सैन्य अत्याचार भविष्य में और बढ़ सकते हैं।


निष्कर्ष:
तिराह घाटी की इस त्रासदी ने एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं — पाकिस्तान की सेना, जिसे देश की सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है, क्या वही अपने ही नागरिकों की दुश्मन बनती जा रही है? क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस पर केवल चिंता जताकर रह जाएगा, या कोई ठोस कदम भी उठाया जाएगा?

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