दिल्ली के किसान नई तकनीक से कर रहे पराली प्रबंधन, पर्यावरण प्रदूषण में आई बड़ी कमी

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March 4, 2026

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-नई मशीनों ने आसान बनाया पराली प्रबंधन

नई दिल्ली/उमा सक्सेना/-      उत्तर भारत में पराली जलाना लंबे समय से एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या बना हुआ था, लेकिन अब दिल्ली के किसान आधुनिक मशीनों की मदद से इसका बेहतर समाधान निकाल रहे हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), दिल्ली के वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों द्वारा चलाए जा रहे जागरूकता अभियानों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और प्रदर्शन गतिविधियों के माध्यम से किसानों को पराली प्रबंधन के नए तरीके सिखाए जा रहे हैं।
इसके परिणामस्वरूप राजधानी और आसपास के इलाकों में इस वर्ष पराली जलाने की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।

सुपर सीडर और हैप्पी सीडर से बढ़ा किसानों का भरोसा
कृषि विज्ञान केंद्र, दिल्ली के अध्यक्ष डॉ. डी.के. राणा के अनुसार, केंद्र द्वारा किसानों को सुपर सीडर, हैप्पी सीडर, रोटावेटर जैसी उन्नत मशीनों के उपयोग के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
इन मशीनों की मदद से खेतों में फसल अवशेष को नष्ट किए बिना ही गेहूं की बुवाई संभव हो पाती है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहती है और अगली फसल की उत्पादकता भी बढ़ती है।
इस तकनीक से किसानों को समय और लागत दोनों की बचत हो रही है,
साथ ही हवा में धुएं की मात्रा कम होने से प्रदूषण स्तर में भी गिरावट आई है।

कृषि विशेषज्ञों ने सराहा किसानों का प्रयास
कृषि विज्ञान केंद्र के विषय विशेषज्ञ श्री कैलाश ने बताया कि KVK के प्रयासों से अब दिल्ली के किसान पराली जलाने के बजाय उसे खेत में ही मिलाकर भूमि की उर्वरता बढ़ाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसानों द्वारा आधुनिक उपकरणों के उपयोग से न सिर्फ खेतों में उत्पादकता बढ़ी है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ा योगदान मिला है।
नई तकनीक से खेतों में नमी बरकरार रहती है और मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ती है,
जिससे किसानों को दीर्घकालिक लाभ मिल रहा है।

वैज्ञानिकों ने दी नई दिशा – खेती और पर्यावरण का संतुलन
KVK दिल्ली के वैज्ञानिकों का मानना है कि यह बदलाव केवल खेती के तरीके तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों की सोच में आए सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक है।
उन्होंने बताया कि आधुनिक मशीनों के इस्तेमाल से मिट्टी की संरचना में सुधार हुआ है,
और इससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी कम किया जा सकता है।
वैज्ञानिकों ने कहा कि जब किसान पराली जलाने के बजाय उसका उपयोग मिट्टी में जैविक खाद के रूप में करते हैं, तो यह न सिर्फ खेती को लाभ पहुंचाता है बल्कि पर्यावरण की रक्षा भी करता है।

कृषि विज्ञान केंद्र की पहल बनी उदाहरण
कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) की यह पहल अब एक प्रेरणादायक उदाहरण बन चुकी है।
दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में किसानों ने आधुनिक तकनीक को अपनाकर
पराली प्रबंधन की समस्या को जड़ से खत्म करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
केंद्र द्वारा चलाए जा रहे अभियान से यह स्पष्ट है कि कृषि और पर्यावरण दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अन्य राज्यों में भी इसी मॉडल को अपनाया जाए,
तो वायु प्रदूषण पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।

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