दलित समुदाय से दूसरे मुख्य न्यायाधीश बने जस्टिस गवई, देश के 52वें CJI के रूप में ली शपथ

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दलित समुदाय से दूसरे मुख्य न्यायाधीश बने जस्टिस गवई, देश के 52वें CJI के रूप में ली शपथ

नई दिल्ली/अनीशा चौहान/ –  भारत के न्यायिक इतिहास में एक और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ गया है। जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई ने बुधवार को देश के 52वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में शपथ ली। राष्ट्रपति भवन में आयोजित विशेष समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और कई वरिष्ठ नेता उपस्थित रहे।

जस्टिस गवई का कार्यकाल 23 दिसंबर 2025 तक रहेगा। वह देश के दूसरे दलित समुदाय से आने वाले मुख्य न्यायाधीश बने हैं। इससे पहले जस्टिस के.जी. बालकृष्णन ने यह उपलब्धि हासिल की थी।

संज्ञा खन्ना की जगह संभाली कमान

जस्टिस गवई ने संजय खन्ना का स्थान लिया, जिनका कार्यकाल 13 मई 2025 को समाप्त हो गया था। जस्टिस गवई का कार्यकाल भले ही महज छह महीने का होगा, लेकिन न्यायपालिका में उनकी नियुक्ति सामाजिक प्रतिनिधित्व और समावेशिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

जस्टिस गवई का जीवन और करियर

24 नवंबर 1960 को महाराष्ट्र के अमरावती में जन्मे जस्टिस गवई ने 16 मार्च 1985 से वकालत की शुरुआत की। उन्होंने बॉम्बे उच्च न्यायालय में प्रशासनिक कानून में अपनी विशेष पहचान बनाई।
वर्ष 2003 में अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त हुए और 2019 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत हुए।

अपने करियर में उन्होंने कई महत्वपूर्ण फैसलों में भूमिका निभाई, जिनमें अनुच्छेद 370 को निरस्त करना और इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक ठहराना शामिल हैं।

सामाजिक समानता के लिए स्पष्ट विचार

जस्टिस गवई ने न्यायपालिका में सामाजिक समानता और प्रतिनिधित्व की वकालत की है। हाल ही में उन्होंने अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा लागू करने का समर्थन किया।
उनका मानना है कि उप-वर्गीकरण सामाजिक न्याय की दिशा में एक आवश्यक कदम है।

साथ ही, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रिटायरमेंट के बाद वे किसी भी राजनीतिक पद को स्वीकार नहीं करेंगे और संविधान को ही सर्वोच्च मानते रहेंगे।

न्यायपालिका में ऐतिहासिक क्षण

जस्टिस गवई की नियुक्ति को दलित समुदाय के लिए गर्व और न्यायपालिका में समावेशिता के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। उनकी सोच, न्यायिक प्रतिबद्धता और सामाजिक न्याय के प्रति समर्पण आने वाले समय में न्यायपालिका की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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