नई दिल्ली/- भारत में धार्मिक आस्था के नाम पर न केवल सबसे ज्यादा दान दिया जाता है बल्कि पूरे देश में यात्रा भी धार्मिक आस्था के लिए ही की जाती है। फिर चाहे वह मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे या फिर चर्च के लिए ही क्यों न हो। वैसे तो धार्मिक आस्था के लिए चंदा देना किसी भी इंसान की अपनी निजी आस्था का मामला है लेकिन धर्मस्थलों पर चढ़ने वाला चढ़ावा व दान के बारे में अगर आप भी जानेगें तो आपके आश्चर्य का ठिकाना नही रहेगा। हमारे राम मंदिर का चंदा कोरोना वैक्सीनेशन के फंड से भी ज्यादा पंहुच चुका है। वही देश के 6 मंदिरों के चढ़ावें की बात करें तो वह मिड डे मील से दोगुना है। इतना ही नही भारत की टेंपल इकोनॉमी 3 लाख करोड़ से ज्यादा की है जो हमारे रक्षा बजट के करीब है। इस समय पूजा स्थलों के फंड पर सरकारी कंट्रोल को लेकर देश में बहस छिड़ी हुई है जो कि सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंची है। वैसे तो देश के कई धार्मिक स्थल सरकारी नियत्रण में आ चुके है लेकिन अभी ऐसे अनेकों धार्मिक स्थल है जिन पर सरकार का नियंत्रण नही है। क्योंकि जब भी कोई धार्मिक स्थल प्रसिद्धि व समृद्धि की तरफ बढ़ता है तो वह सरकारी नियम व कानूनों के दायरे में आने लगता है।
ऊपरी तौर पर देखा जाए तो यह मामला किसी तरह से उलझाऊ नहीं लगता मगर जब तह तक पहुंचेंगे तो इसमें कई तरह के पेंच नजर आने लगेंगे। यही वजह है कि धार्मिक चंदे को लेकर सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय और कई धार्मिक संगठनों ने करीब 15 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म से जुड़े पूजा स्थलों के फंड पर सरकारी कंट्रोल है, जबकि मस्जिद, मजार और चर्च सहित दूसरे धार्मिक स्थलों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। ऐसा क्यों?
इन याचिकाओं में कहा गया है कि सरकार का देश के 9 लाख मंदिरों में से 4 लाख मंदिरों पर नियंत्रण है। जबकि चर्च, मस्जिद, मजार और अन्य धार्मिक स्थलों पर कोई नियंत्रण नहीं है। याचिका में मांग है कि सभी धर्मों के लिए समान धार्मिक संहिता बननी चाहिए। अब सीजेआई यूयू ललित के नेतृत्व वाली बेंच इन याचिकाओं पर 19 सितंबर यानी सोमवार को सुनवाई करेगी।
अब बात करते हैं ‘टेंपल इकोनॉमी’ के बारे में। यानी मंदिर में आने वाला चंदा और मंदिर का खर्च। यह इकोनॉमी भी देश की इकोनॉमी की तरह लगातार बढ़ रही है। देश में करीब 9 लाख रजिस्टर्ड मंदिर हैं जिनमें से 4 लाख मंदिरों में दिल खोलकर चढ़ावा आता है और उससे जुड़े लोगों का घर-बार भी चलता है। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन यानी एनएसएसओ के मुताबिक, देश में ‘टेंपल इकोनॉमी’ 3.02 लाख करोड़ रुपए (40 बिलियन डॉलर) की है। इसमें फूल, तेल, घी, दीपक, चूड़ियां, सिंदूर, मूर्तियां, तस्वीरें, पोशाक समेत पूजा-अर्चना की सभी चीजें शामिल हैं। अगर देश के लिए रक्षा साजो-सामान के आयात की राशि यानी 1 लाख 52 हजार 3 सौ 69 करोड़ रुपए न शामिल की जाए तो ‘टेंपल इकोनॉमी’ देश के इस वर्ष के डिफेंस बजट (3.7 लाख करोड़ रुपए) के लगभग बराबर हो गई है।
अयोध्या के राममंदिर का चंदा कोविड वैक्सिनेशन को दी गई रकम से ज्यादा
केंद्र सरकार ने देश में कोविड वैक्सिनेशन के लिए 5000 करोड़ रुपए दिए। इससे ज्यादा रकम राममंदिर निर्माण के लिए अब तक चंदे में मिली है। राममंदिर निर्माण के लिए राममंदिर ट्रस्ट को मिले चंदे की बात करें तो यह अब तक 5,500 करोड़ रुपए के पार पहुंच गया है।
‘मिड डे मील’ में केंद्र सरकार के बजट से ढाई गुना ज्यादा 6 मंदिरों का चंदा
इतना ही नहीं, यह देश के डिफेंस बजट (करीब 5,25,166 करोड़ रुपए) के 1 फीसदी से ज्यादा है। और तो और सरकारी स्कूलों में चलने वाली ‘मिड डे मील’ योजना का पूरे साल का जितना बजट केंद्र सरकार की तरफ से इस बार बना है, यह रकम उसकी आधी है।
आम बजट 2022-23 में स्कूलों में चलाए जाने वाले ‘मिड डे मिल’ कार्यक्रम में केंद्र सरकार ने 10,234 करोड़ रुपये दिए हैं। इसका करीब ढाई गुना यानी करीब 24 हजार करोड़ रुपए तो देश के महज छह बड़े मंदिरों को सालाना चंदा मिल जाता है।
भारत सरकार के कुल स्वर्ण भंडार का छठा हिस्सा मंदिरों के पास
हमारे देश के बारे में कहा जाता है कि हम ‘गोल्ड प्रेमी’ हैं। ये सिर्फ कहने भर की बात नहीं है, गोल्ड जूलरी के इस्तेमाल में हम पूरी दुनिया में सबसे आगे हैं। हम तो सोना पहनते, सहेजते और रखते हैं लेकिन हमारे भगवान को भी सोना बेहद पसंद है। तभी तो देश के कुल स्वर्ण भंडार का छठा हिस्सा मंदिरों में है।
‘वर्ल्ड गोल्ड कौंसिल’ की रिपोर्ट- 2020 के मुताबिक, भारत के पास 24 हजार टन स्वर्ण भंडार है, जिसमें से 4 हजार टन सोना मंदिरों में है। अब तो हर साल एक हजार टन सोना इस देश में बाहर से मंगाया जा रहा है। बाहर से आए इस सोने का बड़ा हिस्सा धर्मस्थलों पर चढ़ावे की शक्ल में जाता है।
हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध पूजा स्थलों पर लागू हैं 35 कानून
याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने दैनिक भास्कर को बातचीत में बताया कि हिंदुओं के पूजा स्थलों को लेकर 35 कानून लागू हैं जो कि संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का सीधे-सीधे उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट में पिछली सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि यह अंग्रेजों के समय का कानून है। सरकार दूसरे धार्मिक स्थलों को अपने नियंत्रण में क्यों नहीं लेना चाहती है?
मंदिर चंदे पर चोल साम्राज्य से सीखने वाली बात
मंदिरों में चढ़ावा देने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। लेकिन दक्षिण भारत में इस दान का इस्तेमाल लोगों की बेहतरी के लिए ज्यादा शानदार ढंग से किया गया। दक्षिण भारत में आठवीं से 13वीं सदी के दौरान चोल शासनकाल में मंदिरों ने सकारात्मक संस्कृति को जन्म दिया।
मंदिरों में पूजा के अलावा भी चढ़ावे की रकम को कई तरह के जन कल्याणकारी कामों में इस्तेमाल किया जाता था। चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी, मेरठ में इतिहास के प्रोफेसर रहे डॉ. ओमेंद्र सिंह के मुताबिक, चोल मंदिरों के अधिकार में सैकड़ों गांव आते थे। ये मंदिर शिक्षा, सड़क, सिंचाई, न्याय प्रक्रिया और पेड़ लगाने जैसे जनहित कामों की जिम्मेदारी बखूबी निभाते थे। इनकी समितियां होती थीं। मसलन, तोट्टावारियम समिति बाग-बगीचे बनाने का काम करती थी तो एरिवारियम तालाबों के रख-रखाव और निर्माण के काम से जुड़ी थी। सोना-चांदी और मुद्राओं के लिए पोनवारियम समिति थी। इसके अलावा मंदिर के कामों की व्यवस्था कोयिल्वारियम के पास थी।
चोल साम्राज्य की बात हो रही है तो ये भी जान लीजिए कि उस समय मंदिरों ने न केवल अपने चढ़ावे का इस्तेमाल सामाजिक कार्यों में किया बल्कि कला और संस्कृति को भी नए आयाम दिए।
भरतनाट्यम का जन्मदाता रहा है राजराज का बृहदेश्वर मंदिर
चोल शासक राजराज का बृहदेश्वर मंदिर सिर्फ पूजा का स्थान नहीं था, बल्कि एक ऐसा केंद्र था जहां लोग बड़ी संख्या में शाम को जुटते थे, जिसमें संगीतकारों के साथ देवदासियों का नृत्य देखा जाता। इस भव्य मंदिर को रोशन करने के लिए 160 दीपक और मशालें जलाई जाती थीं। इन दीपकों के लिए बड़ी मात्रा में घी की आवश्यकता होती, जिसके लिए गाय, भेड़ और भैंसें पाली जाती थीं। मंदिरों के लिए तंजावुर के पड़ोसी इलाकों में जमीन दी गई थी। राजराज के बनाए बृहदेश्वर मंदिर में ही सादिर अट्टम का जन्म हुआ जो आज भरतनाट्यम के नाम से जाना जाता है।


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