मानसी शर्मा /- कार्तिक माह में पड़ने वाला हर व्रत-त्योहार बहुत खास माना जाता है। इसलिए हिंदू धर्म में अहोई अष्टमी का अपना अलग महत्व है। अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस व्रत को अहोई आठें के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और तरक्की के लिए व्रत रखती है। यह व्रत तारे देखकर खोला जाता है। जो महिलाएं नि:संतान हैं वो संतान प्राप्ति के लिए ये उपवास करती हैं।
अहोई अष्टमी कब है?
हिंदू पंचांग के अनुसार, अहोई अष्टमी तिथि की शुरुआत 23 अक्टूबर बुधवार को रात 1:18 मिनट पर होगी। जिसका समापन 24 अक्टूबर गुरूवार को रात 1:58 मिनट पर होगा। उदयातिथि पड़ने के कारण 24 अक्टूबर गुरुवार को अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाएगा।
अहोई अष्टमी का शुभ मुहूर्त
इस दिन पूजा का मुहूर्त शाम 5:42 से 6:59 मिनट तक है। वहीं, तारों को देखने का समय 6:06 मिनट रहेगा। अहोई अष्टमी के दिन चंद्रोदय का समय रात 11:55 मिनट पर रहेगा।
अहोई अष्टमी की पूजा-विधि
अहोई अष्टमी के दिन माताएं और महिलाएं सुबह उठकर व्रत का संकल्प लें।
इस व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है।
इस दिन माता पार्वती को सिंदूर के साथ सभी श्रृंगार के सामान चढ़ाएं।
इससे आपके वैवाहिक जीवन में खुशहाली के साथ संतान के जीवन में सुख शांति बनी रहती है।
दीवार पर देवी अहोई की छवि निर्मित करें।
पूजा के दौरान व्रत की कथा जरुर सुनें, या पढ़ें।
पूजा में 8 पूड़ी, 8 पुआ तथा हलवा के साथ दूध-भात का भोग लगाया जाता है।
शाम के समय पीपल के पेड़ के नीचे दीया जलाया जाता है।
पूजा के बाद अहोई अष्टमी की आरती करें।
आकाश में तारों को देख कर व्रत का पारण करें।
संतान प्राप्ति के लिए इस दिन चांदी के 9 मोतियों को लाल धागे में पिरकर माता अहोई को अर्पित करें।
अहोई अष्टमी व्रत का महत्व
महिलाएं अहोई अष्टमी का व्रत अपने बच्चों की खुशहाली और लंबी उम्र के लिए रखती हैं। इसके अलावा जो महिलाएं नि:संतान हैं वो संतान प्राप्ति के लिए ये उपवास करती हैं।


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