इंटरपोल की सूचना से खुला अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क, दंपती को अदालत का कठोर दंड

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September 17, 2026

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-34 मासूमों के शोषण मामले में फांसी की सजा

बांदा/चित्रकूट/उमा सक्सेना/-  उत्तर प्रदेश के बांदा जिले की विशेष पॉक्सो अदालत ने नाबालिग बच्चों के यौन शोषण और उनकी आपत्तिजनक सामग्री को डार्कवेब के जरिए विदेशों में प्रसारित करने के गंभीर मामले में निलंबित जूनियर इंजीनियर रामभवन कुशवाहा और उसकी पत्नी दुर्गावती को मृत्युदंड सुनाया है। अदालत ने इस अपराध को “दुर्लभतम से भी दुर्लभ” श्रेणी में रखते हुए कहा कि यह मामला मानवता को झकझोर देने वाला है। फैसले में 34 पीड़ित बच्चों, 74 गवाहों और कई देशों से जुड़े डिजिटल साक्ष्यों का उल्लेख किया गया है।

न्यायालय ने दोषियों पर भारी आर्थिक दंड भी लगाया है तथा राज्य सरकार को प्रत्येक पीड़ित बच्चे को 10-10 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। आरोपियों के घर से बरामद नकदी को भी पीड़ितों के बीच वितरित करने का आदेश दिया गया। तीसरे आरोपी की सुनवाई अलग रखी गई है।

इंटरपोल की शिकायत से शुरू हुई जांच
इस मामले का खुलासा तब हुआ जब इंटरपोल की ओर से केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को विस्तृत ई-मेल शिकायत भेजी गई। शिकायत में आरोप था कि आरोपी कई मोबाइल नंबरों के माध्यम से डार्कवेब पर आपत्तिजनक सामग्री साझा कर रहा है। सीबीआई ने तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर लंबी जांच की और नवंबर 2020 में चित्रकूट स्थित आवास पर छापेमारी कर दंपती को गिरफ्तार किया।

जांच के दौरान कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मेमोरी कार्ड और अन्य डिजिटल सामग्री बरामद की गई। एजेंसी ने करीब पांच वर्षों तक चली जांच के बाद विस्तृत रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत की।

गवाहों को प्रभावित करने का प्रयास
अभियोजन के अनुसार, गिरफ्तारी से पहले आरोपी पक्ष ने कुछ पीड़ितों और उनके परिजनों को प्रभावित करने की कोशिश की। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अपराध की प्रकृति और उसके दुष्परिणाम इतने गंभीर हैं कि दोषियों के प्रति किसी प्रकार की नरमी न्याय के साथ समझौता होगा।

अदालत की टिप्पणी: समाज के लिए खतरा
विशेष न्यायाधीश ने अपने विस्तृत निर्णय में कहा कि इस तरह के अपराध न केवल पीड़ित बच्चों के जीवन पर गहरा असर डालते हैं, बल्कि समाज की नैतिक संरचना को भी नुकसान पहुंचाते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि दोषियों में सुधार की संभावना नहीं दिखती, इसलिए कठोरतम सजा आवश्यक है।

सभी पीड़ितों की आयु तीन वर्ष से लेकर 18 वर्ष से कम बताई गई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और ऐसे अपराधों पर सख्त संदेश देना जरूरी है।

साइबर अपराध और बाल सुरक्षा पर चिंता
यह मामला डार्कवेब और साइबर प्लेटफॉर्म के दुरुपयोग से जुड़े खतरों को उजागर करता है। जांच एजेंसियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और तकनीकी निगरानी के माध्यम से ऐसे नेटवर्क पर अंकुश लगाने की कोशिश जारी है।

दोषियों को मिली सजा को बाल संरक्षण कानूनों के तहत एक अहम फैसला माना जा रहा है, जो भविष्य में ऐसे अपराधों के खिलाफ कड़ा संदेश देता है।

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