नई दिल्ली/उमा सक्सेना/- नई दिल्ली के उझवा स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में सरसों की उन्नत खेती एवं फसल प्रबंधन को लेकर एक दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को सरसों की फसल से अधिक उत्पादन और बेहतर आमदनी के लिए आधुनिक कृषि तकनीकों से अवगत कराना था। प्रशिक्षण के दौरान जनवरी–फरवरी माह में अपनाई जाने वाली वैज्ञानिक पद्धतियों, कीट-रोग नियंत्रण और सिंचाई प्रबंधन पर विस्तार से चर्चा की गई।
125 किसानों ने लिया प्रशिक्षण में हिस्सा
कार्यक्रम की शुरुआत केंद्र के अध्यक्ष डॉ. डी.के. राणा द्वारा की गई। उन्होंने बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र, दिल्ली द्वारा दिल्ली देहात क्षेत्र में कुल 125 किसानों के खेतों में 50 हेक्टेयर क्षेत्रफल में क्लस्टर फ्रंट लाइन डेमोंस्ट्रेशन लगाए गए हैं। इन प्रदर्शनों के अंतर्गत सरसों की उन्नत किस्म आर.एन.-1424 को किसानों के खेतों में स्थापित किया गया है, जिससे उत्पादन में वृद्धि के साथ किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया जा सके।

सिंचाई और पोषक तत्व प्रबंधन पर दिया गया विशेष जोर
प्रशिक्षण सत्र के दौरान फसल की वर्तमान अवस्था को ध्यान में रखते हुए फूल आने की अवस्था पर दूसरी सिंचाई के महत्व को विशेष रूप से समझाया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि सही समय पर सिंचाई करने से दाना भराव बेहतर होता है, जिससे उपज में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। इसके साथ ही संतुलित उर्वरक प्रबंधन, समय पर सिंचाई तथा फसल की नियमित निगरानी जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर भी किसानों को जागरूक किया गया।
कीट एवं रोग नियंत्रण पर दी गई वैज्ञानिक जानकारी
कार्यक्रम में कीट विशेषज्ञों द्वारा सरसों की फसल में लगने वाले प्रमुख कीट एवं रोगों की पहचान और उनके नियंत्रण के उपायों पर भी विस्तार से जानकारी दी गई। किसानों को माहू, आरा मक्खी, चितकबरा कीट, अल्टरनेरिया ब्लाइट, मृदुल फफूंद तथा सफेद रतुआ जैसे रोगों से बचाव के लिए एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) तकनीकों को अपनाने की सलाह दी गई। साथ ही सही समय पर नियंत्रण उपाय अपनाने पर जोर दिया गया।
किसानों ने दिखाई सक्रिय भागीदारी
प्रशिक्षण के दौरान किसानों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और केंद्र में प्रदर्शित सरसों की फसल का अवलोकन भी किया। कार्यक्रम के समापन अवसर पर पौध संरक्षण विशेषज्ञ एवं कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया, जिससे वे अपनी फसल की गुणवत्ता और उत्पादन बढ़ाकर निरंतर आय में वृद्धि कर सकें।


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