नई दिल्ली/अनीशा चौहान/- 21 जुलाई 2025 को उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अचानक स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा देने के बाद देश की राजनीति में हलचल मच गई है। उनके पद छोड़ने के साथ ही राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने कार्यवाहक सभापति का कार्यभार संभाल लिया है, जो कि संविधान के अनुच्छेद 65 के तहत उपराष्ट्रपति की जिम्मेदारी निभाते हैं। अब सबकी निगाहें नए उपराष्ट्रपति के चुनाव पर टिक गई हैं।
चुनाव प्रक्रिया और गणना का तरीका
संविधान के अनुसार, उपराष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा नहीं, बल्कि संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के कुल 782 मौजूदा सांसदों द्वारा किया जाता है। यह चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली और एकल हस्तांतरणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote System) के माध्यम से होता है।
चुनाव में प्रत्येक सांसद को अपनी प्राथमिकता के क्रम में उम्मीदवारों को रैंक देना होता है। पहली गणना में यदि कोई उम्मीदवार 392 वोटों का कोटा हासिल नहीं कर पाता, तो सबसे कम प्रथम वरीयता पाने वाले उम्मीदवार को हटा दिया जाता है, और उनके वोट दूसरी वरीयता के अनुसार अन्य उम्मीदवारों को ट्रांसफर कर दिए जाते हैं। यह प्रक्रिया तब तक चलती है, जब तक कोई उम्मीदवार आवश्यक बहुमत न प्राप्त कर ले।
उपराष्ट्रपति का संवैधानिक महत्व
उपराष्ट्रपति का पद केवल औपचारिक नहीं, बल्कि संसदीय कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला होता है। वे राज्यसभा के सभापति होते हैं और उच्च सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाते हैं। साथ ही, जब राष्ट्रपति अनुपस्थित हों या पद रिक्त हो, तो उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति की भूमिका भी निभा सकते हैं।
राजनीतिक समीकरण और संभावित रणनीतियाँ
वर्तमान में एनडीए (NDA) गठबंधन के पास बहुमत है, जिससे उनके उम्मीदवार की जीत की संभावना अधिक मानी जा रही है। हालांकि, विपक्षी इंडिया ब्लॉक और अन्य क्षेत्रीय दल यदि एकजुट होकर कोई मजबूत उम्मीदवार उतारते हैं, तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।
आने वाले दिन होंगे निर्णायक
चुनाव आयोग जल्द ही उपराष्ट्रपति चुनाव का विस्तृत कार्यक्रम घोषित करेगा। राजनीतिक दलों ने अपने-अपने स्तर पर संभावित उम्मीदवारों के चयन और नामांकन की तैयारी शुरू कर दी है। मतदान के बाद, एक जटिल गणना प्रक्रिया के ज़रिए परिणाम घोषित किया जाएगा और नवनिर्वाचित उपराष्ट्रपति शपथ ग्रहण करेंगे।
यह चुनाव केवल एक संवैधानिक पद भरने का कार्य नहीं है, बल्कि इससे आने वाले समय में संसद की गतिविधियाँ, विधायी दिशा और राजनीतिक संतुलन पर भी गहरा असर पड़ेगा।


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