महंगाई पर आरबीआई की 6 साल में पहली बार विशेष बैठक

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महंगाई पर आरबीआई की 6 साल में पहली बार विशेष बैठक

-आरबीआई सरकार को बताएगी कीमतें बढ़ने की वजह

नई दिल्ली/- आंकड़ों पर नजर डालें तो रिटेल महंगाई 4 साल में करीब दोगुना हो चुकी है और सरकार मंहगाई के आगे बेबस बनी हुई है। साल 2017-18 में महंगाई 3.3 प्रतिशत थी, जो अब 7 प्रतिशत के करीब है। बीते 9 महीनों से महंगाई दर आरबीआई के 2-6 प्रतिशत के दायरे से बाहर बनी हुई है। इस कारण आरबीआई आज एडिशनल मॉनेटरी पॉलिसी मीटिंग कर रहा है। भारत ने 6 साल पहले मुद्रास्फीति-लक्षित मौद्रिक नीति व्यवस्था अपनाई थी, जिसके बाद पहली बार ये मीटिंग हो रही है। इसमें आरबीआई महंगाई कंट्रोल नहीं कर पाने के कारण सरकार को बताएगा।
            साल 2018 के रेट देखें तो नवंबर में तब एक लीटर सोयाबीन तेल 99 रुपए में मिलता था, अब इसके लिए 165 रुपए चुकाने पड़ते हैं। यानी 4 सालों में इसकी कीमत 66 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ चुकी है। इसी तरह एक किलो तुअर दाल 83 रुपए की जगह 118 रुपए में मिल रही है। पेट्रोल के लिए भी 79 रुपए की जगह अब करीब 97 रुपए देने पड़ते हैं।
            ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल होगा कि महंगाई के बढ़ने के क्या कारण होते हैं? सरकार महंगाई को कम क्यों नहीं कर पा रही है? सरकार और आरबीआई के पास महंगाई को कंट्रोल करने के कौन-कौन से साधन हैं? कोविड महामारी के पहले और अब रोजमर्रा की चीजों के दामों में कितना अंतर आया है? जिस तरह से महंगाई बढ़ी है क्या उसी हिसाब से भारत की प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ी है? इन सवालों के जवाब जानने से पहले एक नजर त्ठप् की मीटिंग पर डाल लेते हैं।

आरबीआई एक्ट के सेक्शन 45 जेडएन के तहत मीटिंग
जब भी रिजर्व बैंक महंगाई को तय दायरे में रखने में विफल होता है, तो उसे इसके कारणों को एक्सप्लेन करते हुए सरकार को एक रिपोर्ट देनी पड़ती है। ऐसे में रिजर्व बैंक ने त्ठप् एक्ट के सेक्शन 45 जेडएन के तहत 3 नवंबर को एक एडिशनल मॉनेटरी पॉलिसी मीटिंग बुलाई है। इस मीटिंग में त्ठप् महंगाई को कंट्रोल नहीं कर पाने के कारणों से जुड़ी रिपोर्ट सरकार को सौंपेगा। उसे महंगाई को कंट्रोल करने में कितना समय लगेगा ये भी बताना होगा।

महंगाई बढ़ने के कारण क्या है?
महंगाई के बढ़ने का सीधा-सीधा मतलब आपके कमाए पैसों का मूल्य कम होना है। उदाहरण के लिए, यदि महंगाई दर 7 प्रतिशत है, तो आपके कमाए 100 रुपए का मूल्य 93 रुपए होगा। ऐसे कई फैक्टर हैं जो किसी इकोनॉमी में कीमतों या महंगाई को बढ़ा सकते हैं। आमतौर पर, महंगाई प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ने, प्रोडक्ट और सर्विसेज की डिमांड में तेजी या सप्लाई में कमी के कारण होती है।

महंगाई बढ़ने के 6 बड़े कारण होते हैं-
-डिमांड पुल इन्फ्लेशन तब होती है जब कुछ प्रोडक्ट और सर्विसेज की डिमांड अचानक तेजी से बढ़ जाती है।
-कॉस्ट-पुश इन्फ्लेशन तब होती है जब मटेरियल कॉस्ट बढ़ती है। इसे कंज्यूमर को पास कर दिया जाता है।
-यदि मनी सप्लाई प्रोडक्शन की दर से ज्यादा तेजी से बढ़ती है, तो इसका परिणाम महंगाई हो सकता है।
-कुछ इकोनॉमिस्ट सैलरी में तेज बढ़ोतरी को भी महंगाई का कारण मानते हैं। इससे प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ती है।
-सरकार की पॉलिसी से भी कॉस्ट पुश या डिमांड-पुल इन्फ्लेशन हो सकती है। इसलिए सही पॉलिसी जरूरी है।
-कई देश इंपोर्ट पर ज्यादा निर्भर होते हैं वहां डॉलर के मुकाबले करेंसी का कमजोर होना महंगाई का कारण बनता है।

कमजोर करेंसी और जंग ने बढ़ाई महंगाई
भारत में महंगाई के कारणों की बात करें तो डॉलर की तुलना में रुपया कमजोर होकर 80 के स्तर के पार पहुंच गया है। डॉलर महंगा होने से भारत का आयात और महंगा होता जा रहा है और इससे घरेलू बाजार में चीजों के दाम भी बढ़ रहे हैं। वहीं कोविड के बाद से सप्लाई चेन अभी तक पूरी तरह से पटरी पर नहीं आई है, जिसने महंगाई को बढ़ाया है। इसके अलावा रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण क्रूड ऑयल और खाने-पीने के सामानों के दाम बढ़े हैं।

महंगाई कंट्रोल करने के टूल
1. मॉनेटरी पॉलिसी

सेंट्रोल बैंक के पास रेपो रेट के रूप में महंगाई से लड़ने का एक शक्तिशाली टूल है। जब महंगाई बहुत ज्यादा होती है तो, त्ठप् रेपो रेट बढ़ाकर इकोनॉमी में मनी फ्लो को कम करने की कोशिश करता है। इससे डिमांड में कमी आती है और महंगाई घटती है।

2. इनकम टैक्स में बढ़ोतरी
महंगाई को को कम करने के लिए, सरकार करों (जैसे आयकर और ळैज्) को बढ़ा सकती है और खर्च में कटौती कर सकती है। इससे सरकार की बजट स्थिति में सुधार होता है और अर्थव्यवस्था में मांग को कम करने में मदद मिलती है।

3. फिक्स्ड एक्सचेंज रेट मैकेनिज्म
एक देश निश्चित विनिमय दर तंत्र में शामिल होकर महंगाई को कम रखने की कोशिश कर सकता है। तर्क यह है कि यदि किसी करेंसी का मूल्य निश्चित (या सेमी-फिक्स्ड) है तो यह महंगाई को कम रखने में मदद करता है।

भारत ने क्या कदम उठाए?
-रिजर्व बैंक लगातार रेपो रेट बढ़ा रहा है। मई से अब तक रेपो रेट को 4ः से बढ़ाकर 5.90ः कर दिया गया है।
-सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती की है। इससे पेट्रोल-डीजल के दाम कुछ कम हुए हैं।
-सरकार ने महत्वपूर्ण कच्चे माल पर आयात शुल्क में कटौती की है। इससे प्रोडक्शन कॉस्ट में कमी आई है।
-सरकार ने चीनी के निर्यात पर रोक लगा दी है और गेहूं के निर्यात पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है।
-सरकार ने अगले दो वर्षों के लिए 20 लाख टन कच्चे सूरजमुखी तेल के ड्यूटी फ्री इंपोर्ट की अनुमति दी।

महंगाई के आगे बेबसी क्यों?
भारत में महंगाई बढ़ने को दो मुख्य कारण हैं। खाने के तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी और साथ ही ईंधन की कीमतों में बढ़ेतरी। दालों की कीमतों के बढ़ने से भी इंडियन फूड बास्केट तेजी से बढ़ा है। केंद्र सरकार ने इन दोनों के ही दामों में कमी लाने के लिए कदम उठाए हैं। पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटाने के साथ कच्चे सूरजमुखी तेल के ड्यूटी फ्री इंपोर्ट की अनुमति दी है।
              सरकार के इन कदमों से महंगाई से कुछ हद तक राहत मिली है, लेकिन यह पूरी तरह से कम नहीं हो पाई है। मैन्चुफैक्चरिंग और सप्लाई चेन में दिक्कत महंगाई को बढ़ा रहे हैं। कोरोना महामारी के लॉकडाउन में मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन दोनों प्रभावित हुई थी। इससे माल कम हो गया है और इसलिए उन सामानों की कीमतों में इजाफा हुआ है जो बाजारों तक कम पहुंच रहे हैं। रूस-यूक्रेन जंग ने भी इसमें बड़ा रोल निभाया है।

प्रति व्यक्ति आय घटी
जिस हिसाब से महंगाई बढ़ी है लोगों की आय उस हिसाब से नहीं बढ़ पाई है। केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि साल 2017-18 में देश की प्रति व्यक्ति आय 1,14,958 रुपए थी जो 2021-22 में 91,481 रुपए रह गई।

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