विश्व के प्रसिद्ध राष्ट्र नायकों का अभिनंदन, आरजेएस पीबीएच का सकारात्मक आंदोलन

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August 17, 2026

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विश्व के प्रसिद्ध राष्ट्र नायकों का अभिनंदन, आरजेएस पीबीएच का सकारात्मक आंदोलन

-8 अप्रैल को बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, मंगल पांडे की पुण्यतिथि और कुमार गंधर्व की जयंती पर किया गया याद -राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता से सकारात्मक समसामयिक संवाद का हुआ आगाज़

नई‌ दिल्ली/शिव कुमार यादव/- “जला अस्थियां बारी-बारी चिटकाई जिनमें चिंगारी, जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर लिए बिना गर्दन का मोल कलम, आज उनकी जय बोल।

जो अगणित लघु दीप हमारे तूफानों में एक किनारे,
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल।“
– राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर
रामजानकी संस्थान पॉजिटिव ब्रॉडकास्टिंग हाउस (आरजेएस पीबीएच)के संस्थापक उदय कुमार मन्ना ने कहा कि अगली पीढ़ी में दुनिया के राष्ट्र नायकों के सकारात्मक संस्कार पहुंचाने के लिए द्रूत गति से कार्य हो रहे हैं। महीने में 25 दिन सकारात्मक समसामयिक संवाद को अमली जामा पहुंनाया गया है। यही सकारात्मक भारत-उदय वैश्विक आंदोलन नेशनवाइड टू वर्ल्डवाइड है। आरजेएस पीबीएच परिवार की ओर से वंदेमातरम् गीत के रचयिता बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय की 8 अप्रैल पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि
जन्मः 26 जून, 1838; मृत्युः 8 अप्रैल, 1894)
19वीं शताब्दी के बंगाल के प्रकाण्ड विद्वान् तथा महान् कवि और उपन्यासकार थे। 1874 में प्रसिद्ध देश भक्ति गीत वन्देमातरम् की रचना की । जिसे बाद में आनन्द मठ नामक उपन्यास में शामिल किया गया।  वन्देमातरम् गीत को सबसे पहले 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया था।इन्होंने 1865 में अपना पहला उपन्यास ’दुर्गेश नन्दिनी’ लिखा। बंकिम के दूसरे उपन्यास ’कपाल कुण्डली’, ’मृणालिनी’, ’विषवृक्ष’, ’कृष्णकांत का वसीयत नामा’, ’रजनी’, ’चन्द्रशेखर’ आदि प्रकाशित हुए। राष्‍ट्रीय गीत ’वन्दे मातरम’ के रचयिता बंकिमचन्द्र जी का नाम इतिहास में युगों-युगों तक अमर रहेगा क्योंकि यह गीत उनकी एक ऐसी कृति है जो आज भी प्रत्येक भारतीय के हृदय को आन्दोलित करने की क्षमता रखती है। आधुनिक बंगला साहित्य के राष्ट्रीयता के जनक इस नायक का 8 अप्रैल, 1894 ई. को देहान्त हो गया।

भारतीय आजादी के क्रांतिकारी मंगल पांडे का बलिदान दिवस है 8 अप्रैल पर विनम्र श्रद्धांजलि। मंगल पाण्डेय एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने 1857 में भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वो ईस्ट इंडिया कंपनी की 34वीं बंगाल इंफेन्ट्री के सिपाही थे। तत्कालीन अंग्रेजी शासन ने उन्हें बागी करार दिया जबकि आम हिंदुस्तानी उन्हें आजादी की लड़ाई के नायक के रूप में सम्मान देता है। भारत के स्वाधीनता संग्राम में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को लेकर भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान में सन् 1984 में एक डाक टिकट जारी किया गया। तथा मंगल पांडे द्वारा गाय की चर्बी मिले कारतूस को मुँह से काटने से मना कर दिया था,फलस्वरूप उन्हें गिरफ्तार कर 8 अप्रैल 1857 को फांसी दे दी गई। मंगल पांडे द्वारा लगायी गयी विद्रोह की यह चिंगारी बुझी नहीं और 1947 में देश आजाद हो गया।

टेक्निकल टीम द्वारा आरजेएस पॉजिटिव मीडिया यूट्यूब पर अपलोड कर इसे अगली पीढ़ी के लिए संरक्षित किया गया।

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