मोहन भागवत का बड़ा संकेत: 75 के बाद जिम्मेदारी नई पीढ़ी को सौंपने का वक्त!

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मोहन भागवत का बड़ा संकेत: 75 के बाद जिम्मेदारी नई पीढ़ी को सौंपने का वक्त!

-सरकार और BJP के लिए एक मापदंड करना चाहते हैं तय

नई दिल्ली/सिमरन मोरया/-  संघ प्रमुख मोहन भागवत बार-बार रिटायरमेंट की बात क्यों करते हैं? वह सीधे तौर पर संघ प्रमुख के पद को अलविदा भी कह सकते हैं। दरअसल, इसी में छिपा है वह संदेश, जिसके जरिये भागवत संघ, सरकार और BJP के लिए एक मापदंड तय करना चाहते हैं। वह बताना चाहते हैं कि कोई भी व्यक्ति संगठन से बड़ा नहीं होता और नेतृत्व की एक समय-सीमा होनी चाहिए।

परंपरा या दीवार
मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, दोनों 75 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं। अनौपचारिक तौर पर इस उम्र को रिटायरमेंट की रेखा माना जाता रहा है, लेकिन यही उम्र सीमा अब संघ परिवार और सरकार, दोनों के लिए दीवार बन गई है। जब मोदी 2014 में देश के प्रधानमंत्री बने, तब उन्होंने कहा था कि 2024 तक देश में प्रधानमंत्री पद के लिए कोई वैकेंसी नहीं है। इस बयान से संदेश गया कि वह 75 की उम्र पार करने पर पद को अलविदा कह सकते हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। शायद यही वजह है कि मोहन भागवत बार-बार इस विषय को याद दिलाते हैं।

चिंता की वजह
संघ और BJP का रिश्ता अक्सर दिल और दिमाग जैसा बताया जाता है। लेकिन, हाल में इसी मुद्दे पर दोनों में तनाव के संकेत दिखे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी समेत 75 वर्ष से अधिक उम्र के 20 से ज्यादा नेताओं को टिकट नहीं दिया गया था। तब तत्कालीन BJP अध्यक्ष अमित शाह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि 75 से अधिक उम्र वालों को लोकसभा चुनाव का टिकट नहीं देने का फैसला पार्टी का था। उस समय प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के बयानों से यही लगता था कि पार्टी और सरकार एक ही लीक पर हैं।

बदली रणनीति
लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान पीएम मोदी के रिटायरमेंट को लेकर जमकर बयानबाजी हुई। अरविंद केजरीवाल ने दावा किया कि BJP जीती, तो मोदी केवल एक साल पीएम रहेंगे क्योंकि 75 साल वाला नियम तो उन्होंने ही बनाया है। बात बढ़ी तो अमित शाह ने तुरंत जवाब देते हुए कहा, ‘BJP के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। मोदी जी 2029 तक देश का नेतृत्व करेंगे।’

घर से आवाज
अमित शाह के बयान के बाद विपक्ष का सवाल उठाना बनता है, लेकिन बात बार-बार घर से उठ रही है। कम से कम पांच मौकों पर मोहन भागवत रिटायरमेंट या दायित्व छोड़ने की बात कह चुके हैं। जुलाई 2025 में उन्होंने कहा था, ‘जब आपको 75 साल पूरे होने पर शॉल ओढ़ाई जाती है, तो समझिए कि दूसरों को मौका देने का समय आ गया है। आपको किनारे होना चाहिए।’ इस बार रविवार को मुंबई में उन्होंने कहा कि संघ ने उनसे उनकी उम्र के बावजूद काम जारी रखने को कहा है, लेकिन पद छोड़ने को कहा जाएगा तो वह तुरंत छोड़ देंगे।

संगठन सबसे ऊपर
भले ही संघ का कामकाज BJP से अलग हो, लेकिन दोनों की धुरी एक ही है – राष्ट्र सर्वोपरि, संगठन व्यक्ति से बड़ा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद। मोदी ने कई अवसरों पर कहा है कि पार्टी संगठन से बढ़कर कुछ नहीं है, कार्यकर्ता इसके केंद्र में हैं और हम सब एक परिवार हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने सार्वजनिक रूप से नागपुर में संघ के कार्यक्रम में भाग लिया और मोहन भागवत की मौजूदगी में कहा था कि संघ अब एक वटवृक्ष बन चुका है, जो भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना को ऊर्जावान कर रहा है।

दरार की वजह
यह भी सच है कि मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार बनवाने में संघ की अहम भूमिका रही है। और यह भी सच है कि संघ के अजेंडे – राम मंदिर, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाने और समान नागरिक संहिता – में से दो पूरे हो चुके हैं। लेकिन, RSS-BJP संबंधों में दरार का कारण बना पिछले आम चुनाव में जेपी नड्डा का यह बयान कि पार्टी संघ के बिना भी चुनाव लड़ सकती है। इसका असर चुनाव नतीजों में दिखा। हालांकि बाद में दोनों फिर करीब आए और विधानसभा चुनावों में पार्टी को जीत मिली।

वैचारिक अपेक्षा
अब सवाल यही है कि मोहन भागवत बार-बार रिटायरमेंट की बात क्यों कर रहे हैं? क्या यह प्रधानमंत्री की ओर एक वैचारिक संकेत है कि अब रिटायरमेंट पर गंभीरता से सोचने का वक्त आ गया है? भले रिटायरमेंट का कोई औपचारिक बंधन न हो, लेकिन वैचारिक अपेक्षा तो मौजूद है। और शायद यहीं सवाल खड़ा होता है कि नरेंद्र मोदी पद क्यों नहीं छोड़ना चाहते? संभव है, उन्हें लगता हो कि उनका राजनीतिक और वैचारिक मिशन अभी अधूरा है। दूसरी वजह यह भी हो सकती है कि उनके बाद पीएम पद का उम्मीदवार कौन होगा।

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