भाजपा-आप के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिल्ली एमसीडी चुनाव

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भाजपा-आप के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिल्ली एमसीडी चुनाव

-दिल्ली एमसीडी चुनाव में हार-जीत को लेकर भाजपा-आप में मंथन, कांग्रेस भी कर सकती है करिश्मा -अगर भाजपा हारी तो कौन होगा जिम्मेदार और केजरीवाल हारे तो क्या होगा आम आदमी पार्टी का भविष्य

नई दिल्ली/- दिल्ली में नगर निगम चुनाव जीतना भाजपा और आम आदमी पार्टी दोनों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। भाजपा दिल्ली के नगर निगम में पिछले 15 साल से काबिज है। शीला दीक्षित की प्रचंड लोकप्रियता के दौरान भी भाजपा ने एमसीडी पर अपनी पकड़ बरकरार रखी थी, तो दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015 में प्रचंड जीत हासिल करने के बाद भी केजरीवाल 2017 के निगम चुनाव में भाजपा को निगम से डिगा नहीं पाए। वहीं, दिल्ली विधानसभा में दो बार रिकॉर्ड जीत हासिल कर केजरीवाल इस बार निगम में भी पूरी ताकत के साथ डट गए हैं और स्वयं को निगम का बड़ा दावेदार बता रहे हैं। यही कारण है कि अरविंद केजरीवाल पहली बार गाजीपुर के कचरे के पहाड़ पर पहुंचे और भाजपा को दिल्ली की गंदगी के लिए जिम्मेदार ठहराया, तो भाजपा नेता मनोज तिवारी यमुना की गंदगी के लिए केजरीवाल को जिम्मेदार बता रहे हैं। दोनों प्रमुख दलों की मजबूत दावेदारी में इस बार जीत किसके हाथ लगेगी यह एक बड़ा सवाल बनकर सामने आ रहा है?हालांकि 2017 के प्रदर्शन के आधार को देखा जाये तो कांग्रेस भी इस चुनाव में करिश्मा दिखा सकती है।
            दिल्ली नगर निगम चुनाव 2022 में यदि भाजपा को एक बार और जीत मिलती हैं, तो इसका संदेश दूर तक जाएगा। वह यह बताने की कोशिश करेगी कि जमीन पर मतदाताओं पर उसकी पकड़ अभी भी बनी हुई है। वह इसे अरविंद केजरीवाल से जनता के मोहभंग के रूप में भी प्रचारित करेगी। केवल एक नगर निगम चुनाव होने के बाद भी इसका बड़ा असर होगा और इससे आम आदमी पार्टी की दूसरे राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारियों पर भी असर पड़ेगा।
            वहीं, भाजपा शासित नगर निगम में भ्रष्टाचार होने का आरोप लगाकर आम आदमी पार्टी दिल्ली के नगर निगम में भी सत्ता में आना चाहती है। इसके लिए वह बेहतर स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाएं देने के साथ-साथ मुफ्त बिजली-पानी और मुफ्त यात्राओं पर दांव लगा रही है। यदि इन चुनावों में आम आदमी पार्टी को जीत हासिल होती है, तो वह इसे भाजपा को दिल्ली से उखाड़ फेंकने के रूप में प्रचारित करेगी। मीडिया का बेहतर इस्तेमाल करने के खेल में माहिर केजरीवाल इसे प्रधानमंत्री मोदी पर से लोगों के उठते विश्वास और दिल्ली मॉडल पर जनता के विश्वास के रूप में प्रचारित करेंगे। उन्हें इसका लाभ अन्य राज्यों में भी मिल सकता है।
             भाजपा नगर निगम चुनावों में अपने केंद्रीय नेतृत्व के नाम और काम के भरोसे है। उसके नेता गली-गली में अभी से केंद्र सरकार द्वारा दी गई सुविधाओं आयुष्मान योजना, राशन योजना, पीएम आवास योजना और उज्ज्वल योजनाओं के गुणगान कर रहे हैं। केंद्र सरकार के द्वारा दिल्ली के लिए किये गये कार्यों जैसे प्रगति मैदान में आधुनिक स्तर का निर्माण, भारत वंदना पार्क और विभिन्न सड़कों के निर्माण के द्वारा दिल्ली के प्रदूषण को कम करने के कार्यों की चर्चा कर रहे हैं। भाजपा के पास पीएम मोदी, अमित शाह के साथ-साथ नेताओं की भारी भरकम टीम है। बाहरी राज्यों से आने वाले नेता योगी आदित्यनाथ, पुष्कर सिंह धामी और शिवराज सिंह चौहान भी यहां अपने राज्यों के मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में मोड़ने की भरपूर कोशिश करेंगे।  
             भाजपा को इस बात का भी भरोसा है कि पिछले दिनों जिस तरह शराब-शिक्षा और विभिन्न विभागों में ठेके देने में घोटाले हुए हैं, उससे आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की छवि धूमिल हुई है। राजेंद्र पाल गौतम जैसे नेताओं ने हिंदू देवी-देवताओं का अपमान कर जनता को उससे नाराज किया है। भाजपा को लगता है कि केजरीवाल की कम हुई लोकप्रियता का लाभ उसे मिल सकता है। केजरीवाल सरकार के द्वारा दिल्ली में प्रदूषण कम न कर पाने, यमुना की सफाई न कर पाने और लोगों को साफ़ पानी न उपलब्ध करा पाने से भी भाजपा को लाभ मिलने की उम्मीद है।
               पीएम मोदी और सीएम अरविंद केजरीवाल की प्रचंड लोकप्रियता के दौर में भी कांग्रेस 2017 के निगम चुनाव में 31 सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब रही थी और दर्जनों सीटों पर उसके उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे थे। चूंकि, निगम चुनावों में उम्मीदवारों की स्थानीय स्तर पर लोकप्रियता उनकी जीत में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, इनमें पार्टियों की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित होती है, कांग्रेस भी इस चुनाव में अपने लिए वापसी करने का एक अवसर तलाशने की कोशिश करेगी।
              दिल्ली की राजनीति में कुछ कमजोर होने के बाद भी कांग्रेस के पास विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे मजबूत उम्मीदवार हैं, जो उसे जीत दिला सकते हैं। बदले हालात में उसके पास बेहतर दावेदारी करने वाले कार्यकर्ता उपलब्ध हैं। यदि ऐसा होता है तो कई इलाकों में मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है और इस स्थिति में बाजी किसी भी दल के हाथ लग सकती है?

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