फर्जी विदेशी नौकरी गिरोह का भंडाफोड़, साइबर पुलिस नॉर्थ जिला की बड़ी कार्रवाई

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फर्जी विदेशी नौकरी गिरोह का भंडाफोड़, साइबर पुलिस नॉर्थ जिला की बड़ी कार्रवाई

-शिकायत से शुरू हुई जांच -शिकायतकर्ता से ऑस्ट्रेलिया वीज़ा के नाम पर ₹3.12 लाख की ठगी हुई थी -तकनीकी जांच और 1000 किमी की छापेमारी के बाद दो आरोपी गिरफ्तार

नई दिल्ली/उमा सक्सेना/-    दिल्ली के लक्ष्मी विहार, बुराड़ी निवासी धर्मेंद्र (उम्र 40 वर्ष) ने ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई कि उन्हें ऑस्ट्रेलिया में नौकरी और वीज़ा दिलाने के नाम पर ₹3,12,000 की ठगी की गई। धर्मेंद्र ने हॉस्पिटैलिटी और टूरिज़्म मैनेजमेंट में सिंगापुर से कोर्स किया था और नौकरी की तलाश में उन्होंने कई व्हाट्सऐप ग्रुप जॉइन किए थे। इन्हीं में से एक ग्रुप “वर्क इंफॉर्मेशन” पर उनकी मुलाकात एक शख्स से हुई, जिसने अपना नाम मयंक पांडे बताया और ऑस्ट्रेलिया का वीज़ा दिलाने का झांसा दिया। शुरुआत में उसने वियतनाम का वीज़ा दिलाकर भरोसा जीता और बाद में अलग-अलग बहानों से मोटी रकम वसूल ली।

तकनीकी जांच से मिली सफलता
मामले की गंभीरता देखते हुए साइबर थाना, नॉर्थ की एक विशेष टीम बनाई गई जिसमें एसआई अरविंद यादव, एचसी हिमांशु और कॉन्स्टेबल रवि शामिल थे। टीम ने इंस्पेक्टर रोहित गहलोत (SHO/साइबर थाना) के नेतृत्व और एसीपी हेमंत कुमार मिश्रा के मार्गदर्शन में जांच शुरू की। तकनीकी जांच में व्हाट्सऐप डेटा, गूगल से प्राप्त सूचनाएं, आईपी लॉग, सीडीआर और बैंक ट्रांजैक्शन का गहन विश्लेषण किया गया। लगभग 50 मोबाइल नंबरों और कई खातों की मनी ट्रेल खंगाली गई। लगातार निगरानी और 1000 किलोमीटर लंबी छापेमारी अभियान के बाद टीम यूपी के एटा ज़िले में पहुंचे और वहां से मुख्य आरोपी को दबोच लिया।

आरोपियों की गिरफ्तारी और बरामदगी
11 सितंबर 2025 को एटा, यूपी से 37 वर्षीय साहदेव सिंह को गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में उसने अपनी साथी नीरज (पत्नी जय प्रकाश उर्फ योगेंद्र की) का नाम बताया, जिसके बैंक खाते का इस्तेमाल वह पैसों की लेन-देन में करता था। पुलिस ने नीरज को भी गिरफ्तार कर लिया। छापेमारी के दौरान पुलिस ने 2 मोबाइल फोन, 3 पासबुक, 3 चेकबुक, 2 डेबिट कार्ड, 5 भारतीय सिम कार्ड और 3 वियतनामी सिम कार्ड बरामद किए। साथ ही, आरोपियों के बैंक खाते फ्रीज़ कर दिए गए और शिकायतकर्ता की ₹78,920 की राशि होल्ड में ले ली गई।

पूछताछ में खुलासा
इंटरोगेशन में साहदेव सिंह ने बताया कि वह कई बार नौकरी की तलाश में विदेश गया लेकिन असफल रहा। वहीं उसकी मुलाकात वियतनाम में एक एजेंट विजय से हुई, जो फर्जी विदेशी नौकरियों का रैकेट चला रहा था। इसी के बाद साहदेव सिंह ने वियतनाम और मलेशिया के मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल करते हुए “मयंक पांडे”, “राहुल कुमार” और “अजय यादव” जैसे नामों से फर्जी विज्ञापन डालने शुरू किए। पहले वह छोटे-छोटे वीज़ा देकर भरोसा जीतता और फिर मोटी रकम ऐंठकर लोगों को ब्लॉक कर देता।

गिरोह का तरीका (Modus Operandi)
यह गिरोह व्हाट्सऐप ग्रुप्स के ज़रिए युवाओं को ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में नौकरी का लालच देता था। संपर्क करने पर पीड़ित से व्यक्तिगत जानकारी लेकर पहले वियतनाम का वीज़ा दिलाता, जिससे भरोसा कायम हो। फिर अलग-अलग शुल्क जैसे वर्क परमिट, यूएसडीटी डिपॉजिट या वेरिफिकेशन के नाम पर लाखों रुपये मंगवाए जाते और भुगतान मिलते ही पीड़ित को ब्लॉक कर दिया जाता।

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