देश के सभी स्कूलों से हटेंगी जहरीली एस्बेस्टस छतें, एनजीटी का ऐतिहासिक आदेश

स्वामी,मुद्रक एवं प्रमुख संपादक

शिव कुमार यादव

वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी

संपादक

भावना शर्मा

पत्रकार एवं समाजसेवी

प्रबन्धक

Birendra Kumar

बिरेन्द्र कुमार

सामाजिक कार्यकर्ता एवं आईटी प्रबंधक

Categories

May 2026
M T W T F S S
 123
45678910
11121314151617
18192021222324
25262728293031
May 8, 2026

हर ख़बर पर हमारी पकड़

देश के सभी स्कूलों से हटेंगी जहरीली एस्बेस्टस छतें, एनजीटी का ऐतिहासिक आदेश

नई दिल्ली/उमा सक्सेना/-     बच्चों के स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने एक ऐतिहासिक आदेश जारी किया है। ट्रिब्यूनल ने पूरे देश के सरकारी और निजी स्कूलों को निर्देश दिया है कि वे एक वर्ष के भीतर एस्बेस्टस (Asbestos) की छतों को पूरी तरह हटाकर सुरक्षित विकल्पों से बदलें। यह फैसला देशभर के लाखों बच्चों की जिंदगी और स्कूल वातावरण की स्वच्छता को लेकर एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

बच्चों की सेहत को प्राथमिकता, एक साल की समयसीमा तय
एनजीटी की न्यायिक पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. अफरोज अहमद शामिल हैं, ने कहा कि एस्बेस्टस की छतें फेफड़ों की गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती हैं, इसलिए इनका इस्तेमाल शिक्षा संस्थानों में अस्वीकार्य है।
ट्रिब्यूनल ने स्कूलों को एक साल की अवधि में सभी खराब शीट्स हटाने और अच्छी स्थिति वाली शीट्स पर सुरक्षात्मक कोटिंग लगाने का आदेश दिया है। जिन जगहों पर ये शीटें जर्जर हैं, उन्हें गीला कर विशेषज्ञों की देखरेख में हटाया जाएगा ताकि हवा में जहरीले रेशे न फैलें।

प्रशिक्षित कर्मचारी और प्रमाणित एजेंसियां ही करेंगी काम
एनजीटी ने निर्देश दिया है कि एस्बेस्टस से जुड़ी किसी भी मरम्मत या हटाने की प्रक्रिया में केवल प्रमाणित पेशेवरों और अधिकृत एजेंसियों की सेवाएं ली जाएं।
साथ ही, स्कूल प्रशासन को अपने कर्मचारियों को एस्बेस्टस के जोखिम और सावधानियों पर प्रशिक्षण देने की अनिवार्यता भी बताई गई है।
ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि एस्बेस्टस का निपटान सामान्य कचरे की तरह नहीं किया जा सकता -इसके लिए सीलबंद कंटेनरों या विशेष बैगों में पैक कर, केवल अनुमोदित खतरनाक अपशिष्ट स्थलों तक पहुंचाया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी जारी था प्रयोग
एनजीटी ने इस बात पर नाराज़गी जताई कि 2011 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद कई राज्यों में अब भी स्कूलों की छतों में एस्बेस्टस का उपयोग किया जा रहा है।
पीठ ने पाया कि अधिकांश राज्यों ने अब तक न तो इस पर सर्वे रिपोर्ट तैयार की है, न ही किसी प्रकार की कार्ययोजना बनाई है। इसके अलावा, केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की निगरानी व्यवस्था को भी अपर्याप्त बताया गया।
ट्रिब्यूनल ने अब इस पूरे अभियान की मॉनिटरिंग खुद करने का निर्णय लिया है। न्यायमित्र समय-समय पर प्रगति की जांच करेंगे और रिपोर्ट पेश करेंगे।

मंत्रालयों को सौंपी जिम्मेदारियां, एक महीने में एक्शन प्लान
एनजीटी ने इस निर्णय को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और वायु प्रदूषण रोकथाम अधिनियम, 1981 के प्रावधानों के तहत जारी किया है।
फैसले में कहा गया है कि शिक्षा मंत्रालय राज्यों को दिशा-निर्देश और आवश्यक वित्तीय सहायता प्रदान करेगा, जबकि पर्यावरण मंत्रालय और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) नई नीति और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करेंगे।
राज्य सरकारों को आदेश दिया गया है कि वे एक महीने के भीतर सर्वे और हटाने की कार्ययोजना बनाएं तथा हर तीन महीने में रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
स्वास्थ्य मंत्रालय को एस्बेस्टस से जुड़ी बीमारियों पर अध्ययन और जनजागरूकता अभियान शुरू करने की जिम्मेदारी दी गई है।

श्रमिकों की सुरक्षा सर्वोच्च, पालन न करने पर कार्रवाई
एनजीटी ने उन सभी स्थलों के लिए कड़े मानक तय किए हैं, जहां एस्बेस्टस सामग्री का उपयोग या हटाने का कार्य किया जाएगा।
आदेश के अनुसार, कार्यस्थलों पर हवा की गुणवत्ता की निगरानी, खतरे के संकेतक बोर्ड लगाना, सुरक्षात्मक उपकरण (PPE) पहनना और नियमित स्वास्थ्य जांच अनिवार्य होगी।
साथ ही, ऐसे क्षेत्रों में धूम्रपान, भोजन या पानी पीने पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा।
एनजीटी ने चेतावनी दी है कि यदि स्कूल प्रबंधन खुद ऑडिट करेगा या दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करेगा, तो संबंधित संस्थान पर जुर्माना और संचालन पर रोक लगाई जा सकती है।

बच्चों की सुरक्षा के लिए दाखिल हुई थी याचिका
यह मामला तब सामने आया जब दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के एक अतिथि प्रोफेसर ने देशभर के स्कूलों से एस्बेस्टस हटाने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी।
याचिकाकर्ता ने कहा था कि एस्बेस्टस की शीट टूटने पर इसके सूक्ष्म रेशे हवा में फैल जाते हैं, जो बच्चों के फेफड़ों में जाकर कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं।
उन्होंने 2022 में नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित एक अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि एस्बेस्टस युक्त भवनों में धूल प्रदूषण की मात्रा कई गुना बढ़ जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी अपने दिशानिर्देशों में सभी प्रकार के एस्बेस्टस को फेफड़ों, स्वरयंत्र और अंडाशय के कैंसर का प्रमुख कारण बताया है।

स्वच्छ सांसों की ओर एक निर्णायक कदम
एनजीटी का यह फैसला न केवल बच्चों की सेहत के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि यह पर्यावरणीय सुधार की दिशा में भी एक ऐतिहासिक पहल है।
देशभर के लाखों विद्यालयों से एस्बेस्टस की छतें हटने के बाद विद्यार्थियों को स्वच्छ, सुरक्षित और प्रदूषणमुक्त वातावरण में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलेगा।
अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि आने वाले महीनों में राज्य सरकारें और स्कूल प्रबंधन इस आदेश को किस तेजी और गंभीरता से लागू करते हैं।

About Post Author

आपने शायद इसे नहीं पढ़ा

Subscribe to get news in your inbox