नई दिल्ली/ उमा सक्सेना/- देश में साइबर ठगी के मामले लगातार नए और ज्यादा खतरनाक रूप ले रहे हैं। अब जालसाज पारंपरिक कॉल या फिशिंग लिंक से आगे बढ़कर ऐसी तकनीक अपना रहे हैं, जो सीधे मोबाइल नेटवर्क को ही निशाना बनाती है। हाल ही में सामने आए मामलों में पता चला है कि स्कैमर्स पोर्टेबल और फर्जी मोबाइल टावरों का इस्तेमाल कर लोगों के फोन को अपने जाल में फंसा रहे हैं। यह तरीका सामान्य मैसेज फ्रॉड जैसा दिखता जरूर है, लेकिन इसके पीछे बेहद एडवांस नेटवर्क हैकिंग तकनीक काम करती है, जिससे यूजर का मोबाइल असली नेटवर्क की बजाय नकली सिग्नल से कनेक्ट हो जाता है।
आज के समय में स्मार्टफोन केवल बातचीत का साधन नहीं, बल्कि बैंकिंग, ऑनलाइन पेमेंट, ओटीपी वेरिफिकेशन और निजी डाटा का मुख्य जरिया बन चुका है। ऐसे में अगर मोबाइल का नेटवर्क ही समझौता कर लिया जाए तो यूजर को बिना जानकारी के भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। साइबर विशेषज्ञों के मुताबिक ठग ‘फेक BTS’ यानी नकली बेस ट्रांससीवर स्टेशन का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो असली टावर जैसा सिग्नल देता है। फोन जब मजबूत नेटवर्क की तलाश करता है तो वह धोखे से इसी फर्जी टावर से जुड़ जाता है। यह डिवाइस छोटे बैग, कार की डिक्की या किसी सुनसान जगह पर आसानी से छिपाए जा सकते हैं, जिससे इन्हें पकड़ पाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
एक बार फोन नकली नेटवर्क से कनेक्ट हो जाए तो स्कैमर्स उसे 4G या 5G से हटाकर कम सुरक्षित 2G जैसे कमजोर नेटवर्क पर शिफ्ट कर देते हैं। इसी दौरान ‘SMS ब्लास्ट’ तकनीक का इस्तेमाल होता है। इसके जरिए बड़े पैमाने पर फर्जी मैसेज भेजे जाते हैं, जो बैंक अलर्ट, अकाउंट ब्लॉक या केवाईसी अपडेट जैसे दिखते हैं। मैसेज में दिए गए लिंक पर क्लिक करते ही यूजर का संवेदनशील डेटा, ओटीपी या बैंक डिटेल्स हैकर्स तक पहुंच जाती हैं। कई मामलों में यूजर के नंबर से ही दूसरे लोगों को भी फर्जी संदेश भेजे जाने लगते हैं, जिससे ठगी का दायरा और बढ़ जाता है।
यह खतरा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसे नेटवर्क फ्रॉड के मामले सामने आ चुके हैं। यूरोप के कई देशों में पुलिस ने कारों में छिपाए गए फर्जी मोबाइल सिस्टम के जरिए लोगों के फोन हाईजैक करने वाले गिरोहों को पकड़ा है। इससे साफ है कि यह कोई अफवाह नहीं, बल्कि वास्तविक और तेजी से फैलती साइबर अपराध की तकनीक है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की धोखाधड़ी में यूजर को पता भी नहीं चलता कि उसका फोन सुरक्षित नेटवर्क से हटकर असुरक्षित चैनल पर चला गया है। इसके चलते बैंकिंग ओटीपी चोरी होना, फर्जी ट्रांजैक्शन, डेटा लीक और पहचान की ठगी जैसे गंभीर खतरे पैदा हो जाते हैं। टेलीकॉम कंपनियां नेटवर्क सिक्योरिटी मजबूत करने के दावे तो करती हैं, लेकिन फर्जी टावरों को पूरी तरह रोकना तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण बना हुआ है, क्योंकि फोन स्वाभाविक रूप से सबसे मजबूत सिग्नल को ही प्राथमिकता देता है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में नेटवर्क लेवल पर नई सुरक्षा व्यवस्था और सख्त मॉनिटरिंग सिस्टम लागू करने की जरूरत होगी। साथ ही आम लोगों को भी सतर्क रहना होगा और किसी भी संदिग्ध लिंक, बैंक मैसेज या अचानक आए अलर्ट पर तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए। जागरूकता ही इस नई डिजिटल ठगी से बचाव का सबसे बड़ा हथियार है।


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